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वॉलीबॉल: सवा छह फीट की मालती...इनके नाप के सूट नहीं मिलते, बोलीं- राइट टू स्पोर्ट्स की होनी चाहिए व्यवस्था

अमर विश्वकर्मा, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Sun, 11 Jan 2026 06:06 AM IST
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सार

Varanasi News: काशी में आयोजित 72वीं वॉलीबॉल नेशनल चैंपियशिप में सीनियर स्पोर्ट्स ऑफिसर मालती चौहान ने कहा राइट टू स्पोर्ट्स की व्यवस्था भी होनी चाहिए। लड़कियों को समय रहते अपने गोल पर फोकस कर लेना चाहिए, इसी से उनका भविष्य निखरेगा।

Volleyball Malti chauhan says she can find clothes fit size should be system in place to ensure right to sport
राजस्थान सचिवालय में तैनात सीनियर स्पोर्ट्स ऑफिसर मालती चौहान। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Sports News: गरीब बच्चा ही उम्दा खिलाड़ी बनता है क्योंकि उसके अंदर कुछ पाने और बहुत कुछ करने की चाह होती है। लड़कियों की बात करें तो खेल की विधा को अपनाते ही उसके अंदर एक व्यावहारिक ज्ञान आ जाता है। आप सामान्य और महिला खिलाड़ी को एक साथ खड़ा कर यह अंतर देख सकते हैं। मेरा मानना है कि राइट टू एजुकेशन और राइट टू इनफॉर्मेशन की तरफ राइट टू स्पोर्ट्स भी होना चाहिए।

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यह कहना है राजस्थान सचिवालय में तैनात सीनियर स्पोर्ट्स ऑफिसर मालती चौहान का जो वाराणसी के सिगरा स्टेडियम में चल रही चैंपियनशिप में बतौर पर्यवेक्षक हिस्सा लेने आई हैं। वे ऐसे आयोजनों में खिलाड़ियों...खासतौर से लड़कियों का भविष्य देखती हैं। लगभग सवा छह फीट की मालती चौहान को अपनी हाइट के कारण रेडिमेड सूट सहित दूसरे कपड़े जल्द नहीं मिल पाते इसलिए सिलवाती हैं। अपने प्रोफेशन के हिसाब से जींस का पैंट नहीं पहनती हैं।

...जब पिता नहीं रहे

मालती चौहान महज चार वर्ष की थीं, जब उनके पिता ललित सिंह की मृत्यु हो गई। मां कमला ने बमुश्किल के आम खर्चों को संभालते हुए मालती और उनके भाई की शिक्षा-दीक्षा पूरी की। 16 वर्ष की उम्र में मालती को कोच अब्दुल अजीज खान ने वॉलीबॉल का हुनर सिखाया। 1986 में उन्होंने सीनियर स्टेट खेला और घर आईं तो भाई घनश्याम ने पूरे मोहल्ले में घूमकर लोगों को बताया कि दीदी ने वॉलीबॉल में बेहतरीन जीत हासिल की है।

दर्जनों चैंपियनशिप में उम्दा प्रदर्शन करते हुए मालती ने 1990 में थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। सीनियर स्पोर्ट्स ऑफिसर बताती हैं कि 40 साल पहले मुझे 100 रुपये महिने स्कॉलरशिप मिलते थे, इसी से मैं अपने खर्चों को मैनेज करती थीं।

खेल में बेहतरीन प्रदर्शन और लगन को देखते हुए राजस्थान सरकार में उन्हें सीनियर स्पोर्ट्स ऑफिसर का पद मिला। राज्य में एकमात्र पद के कर्त्तव्यों का मालती चौहान बखूबी निर्वहन कर रही हैं। वे खेल में लड़कियों के लिए काफी गंभीर हैं। खेल के हुनर को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने शादी नहीं की।

खेल कोटा के कर्मचारियों का कार्यकाल बढ़ाने की बात

बहुत गंभीरता और मजबूती से कहती हैं कि खिलाड़ी कोटे से जो भी सरकारी कार्यों में सेवारत हैं, उनके रिटायरमेंट उम्र 60 से 70 कर देनी चाहिए, क्योंकि आम लोगों के मुकाबले एक प्लेयर मानसिक और शारीरिक तरीके से काफी तंदुरुस्त होता है।

खेल के क्षेत्र में जहां अक्सर संसाधनों और सामाजिक दबावों की कमी आड़े आती है, वहीं मालती चौहान ने अपने जज्बे और समर्पण से एक अलग मिसाल कायम की है। उन्होंने अपना पूरा जीवन खेल की तालीम को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित कर दिया। आज मालती ने खेल के जरिए अनुशासन, आत्मविश्वास और बेहतर भविष्य की नींव भी रख रही हैं।

खेल का हुनर बांटने का सफर जारी है

सीनियर स्पोर्ट्स ऑफिसर मालती का मानना है कि खेल सिर्फ शारीरिक क्षमता बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि यह जीवन को सही दिशा देने का सबसे मजबूत जरिया है। इसी सोच के साथ वे आगे बढ़ रही हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और लगातार अपने प्रयास जारी रखे।

मालती के प्रशिक्षण से निकले कई खिलाड़ी जिला और राज्य स्तर पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं। मालती चौहान की कहानी नारी सशक्तीकरण, समर्पण और सामाजिक बदलाव की प्रेरणादायक मिसाल है, जो यह साबित करती है कि जुनून हो तो राह खुद बन जाती है। इस समय मालती के घर में भाई घनश्याम व्यवसाय में हैं। उनकी पत्नी भावना सिंह फिजिकल टीचर हैं। मालती चौहान का भतीजा अभ्युदय सिंह भी बुआ से खेल का हुनर सीख रहा है।

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