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बिलासपुर हाईकोर्ट: 'झूठे दहेज और टोनही आरोप मानसिक क्रूरता', अन्य मामले में अधिकारियों के खिलाफ याचिका रद्द

अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 09 Mar 2026 09:42 PM IST
Bilaspur High Court gave important verdict in two separate cases
बिलासपुर हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा कि पति और उसके परिवार पर दहेज उत्पीड़न और टोनही प्रताड़ना के झूठे आरोप लगाना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। डिवीजन बेंच ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पति की तलाक याचिका स्वीकार कर ली। वहीं एक अन्य मामले में  पूर्व चीफ जस्टिस, एक वर्तमान हाईकोर्ट जस्टिस और राज्य की उच्च न्यायिक सेवा के कई अधिकारियों के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत रद्द कर दी है। 

जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की बेंच ने यह फैसला देते हुए बलौदाबाजार फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त कर दिया। प्रकरण के अनुसार बलौदाबाजार निवासी दिनेश साहू और पद्मा साहू का 15 फरवरी 2015 को विवाह हुआ था। पति का आरोप था कि विवाह के लगभग 10-11 दिन बाद ही पत्नी मायके चली गई और उस पर अलग रहने का दबाव बनाने लगी। इसके बाद पत्नी ने पति, उसके माता-पिता और भाइयों सहित परिवार के पांच सदस्यों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना और टोनही प्रताड़ना अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करा दी।

इन आरोपों के बाद पति ने बलौदाबाजार फैमिली कोर्ट में क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक की याचिका दायर की। फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि क्रूरता और परित्याग के आरोप पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुए हैं। इस फैसले के खिलाफ पति ने हाईकोर्ट में अपील प्रस्तुत की।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पति और उसके परिजनों पर टोनही जैसे गंभीर और सामाजिक रूप से अपमानजनक आरोप लगाए गए, जिससे उन्हें लंबे समय तक मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। अदालत ने कहा कि पति और उसके परिवार को लगभग सात वर्षों तक झूठे मुकदमों का सामना करना पड़ा, जो अपने आप में गंभीर मानसिक पीड़ा का कारण है। बेंच ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के झूठे और गंभीर आरोप वैवाहिक संबंधों में मानसिक क्रूरता के दायरे में आते हैं। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए पति के पक्ष में तलाक की डिक्री जारी कर दी। पत्नी को यह स्वतंत्रता भी दी गई है कि वह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत गुजारा भत्ता के लिए अलग से आवेदन प्रस्तुत कर सकती है।

कई अधिकारियों के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत रद्द 
वहीं छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में महत्वपूर्ण फैसले में पूर्व चीफ जस्टिस, एक वर्तमान हाईकोर्ट जस्टिस और राज्य की उच्च न्यायिक सेवा के कई अधिकारियों के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत रद्द कर दी है। कोर्ट ने कहा कि केवल आशंका और अनुमान के आधार पर न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही चलने देना न्यायिक संस्थाओं की गरिमा को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल किसी को परेशान करने, डराने या व्यक्तिगत अथवा सेवा संबंधी शिकायतों को आपराधिक मुकदमे का रूप देने के लिए नहीं किया जा सकता। खंडपीठ ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही शुरू करना कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों और उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारियों को तलब करने के गंभीर परिणाम होते हैं। इसलिए आपराधिक कानून को उत्पीड़न या दबाव का साधन नहीं बनने दिया जा सकता।

पूरा मामला वर्ष 2015 की एक घटना से जुड़ा है, जिसमें एक टोल प्लाजा पर शिकायतकर्ता के पति के साथ कथित दुर्व्यवहार का आरोप लगाया गया था। उस समय शिकायतकर्ता के पति प्रभाकर ग्वाल सुकमा में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत थे। इस घटना को लेकर एक प्राथमिकी भी दर्ज की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उस एफआईआर में पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल नहीं किया, क्योंकि इसमें पुलिस अधिकारियों, न्यायिक अधिकारियों, तत्कालीन चीफ जस्टिस और एक वर्तमान हाईकोर्ट जस्टिस की कथित साजिश शामिल थी।

हाईकोर्ट ने शिकायत की जांच करते हुए पाया कि इसमें साजिश से जुड़ा कोई ठोस तथ्य या साक्ष्य नहीं है। अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी के तहत साजिश सिद्ध करने के लिए यह दिखाना जरूरी होता है कि दो या अधिक व्यक्तियों के बीच किसी अवैध कार्य को करने के लिए स्पष्ट सहमति या योजना बनी थी। खंडपीठ ने कहा कि शिकायत में ऐसे किसी भी ठोस तथ्य का उल्लेख नहीं है।

शिकायतकर्ता ने स्वयं यह कहा कि आरोप पत्र दाखिल न होने के पीछे साजिश होने की आशंका है, लेकिन इसके समर्थन में कोई ठोस सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई। कोर्ट ने कहा कि पूरे आरोप केवल आशंका और संदेह पर आधारित हैं। शिकायत में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि संबंधित जजों या अधिकारियों के बीच किसी तरह की साजिश, सहमति या योजना बनी थी।

मामले में शिकायतकर्ता की ओर से यह भी आरोप लगाए गए कि उनके पति को नक्सल प्रभावित क्षेत्र में स्थानांतरण, वेतन वृद्धि रोकने और सेवा समाप्ति जैसी प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ा। इस पर अदालत ने स्पष्ट कहा कि ऐसे विवाद सेवा कानून के दायरे में आते हैं और इन्हें आपराधिक साजिश का रूप नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की शिकायत को जारी रहने देना कानून की प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग होगा। इससे संबंधित व्यक्तियों को बिना किसी ठोस आधार के अनावश्यक आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़ेगा।

इसी आधार पर अदालत ने शिकायत रद्द करते हुए कहा कि न्यायपालिका और सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के खिलाफ केवल अनुमान या आशंका के आधार पर आपराधिक मुकदमे नहीं चलाए जा सकते।
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