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Bilaspur: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में राज्यपाल द्वारा रोके गए विधेयकों पर सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र
अमर उजाला नेटवर्क, बिलासपुर (छत्तीसगढ़) Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Fri, 03 Jul 2026 10:30 PM IST
हाईकोर्ट में करीब तीन साल बाद राज्यपाल द्वारा विधानसभा से पारित विधेयकों को रोकने वाली लंबित याचिका पर सुनवाई हुई। 2019 से 2023 के बीच छत्तीसगढ़ विधानसभा से पारित कई विधेयक राज्यपाल ने बिना निर्णय के रोक रखे हैं। तत्कालीन छत्तीसगढ़ सरकार और आदिवासी कार्यकर्ता संत कुमार नेताम ने इन विधेयकों को रोकने के खिलाफ याचिका दायर की थी।
मामले की सुनवाई जस्टिस ए के प्रसाद की सिंगल बेंच में हुई। राज्य सरकार के महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने याचिका वापस लेने की इच्छा जताई। इसके लिए उन्होंने विधिवत आवेदन देने हेतु दो सप्ताह का समय मांगा। वहीं, संत कुमार नेताम के अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ने याचिका वापस लेने से इन्कार किया।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले का हवाला दिया। अधिवक्ता ने बताया कि राज्यपाल विधानसभा से पारित विधेयक को लंबे समय तक नहीं रोक सकते। संत कुमार नेताम ने विशेष रूप से आरक्षण बढ़ाने वाले विधेयक को मंजूरी देने की मांग की है। जस्टिस प्रसाद ने राज्य सरकार को आवेदन के लिए दो सप्ताह का समय दिया। नेताम के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रति प्रस्तुत करने की बात कही।
2018 से 2023 के बीच कांग्रेस सरकार के समय कई विधेयक राज्यपाल ने मंजूर नहीं किए थे। इनमें कुशा भाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय का नाम बदलकर चंदूलाल चंद्राकर विश्वविद्यालय करने वाला विधेयक भी शामिल था। ऐसे मामले कई अन्य राज्यों में भी सामने आए थे। तब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस मसले को अपने हाथ में लिया था।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और सांविधानिक स्थिति
पिछले साल सितंबर में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, राज्यपाल विधेयक को असीमित काल के लिए नहीं रोक सकते। उन्हें उस पर कोई फैसला लेना होगा, जैसे पुनः विधानसभा को विचारार्थ भेजना या राष्ट्रपति को विचारार्थ भेजना। संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत, यदि विधानसभा विधेयक को पुनः पारित करती है, तो राज्यपाल उसे रोक नहीं सकते। प्रजातंत्र में मूल शक्ति निर्वाचित व्यक्तियों के पास है, अतः विधानसभा से पारित विधेयक को मनमाने तरीके से रोका जाना गलत है।
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