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historic camel fair of Loharu-Baralu in Bhiwani is still vibrant today, but the declining number of participants is a cause for concern
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भिवानी के लोहारू–बरालू का ऐतिहासिक ऊंट मेला आज भी जीवंत, लेकिन घटती संख्या चिंता का विषय
पिलानी रोड स्थित गौशाला के बाहर लगने वाला लोहारू–बरालू क्षेत्र का पारंपरिक ऊंट मेला बीते करीब 50 वर्षों से अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। यह ऐतिहासिक मेला हर वर्ष कुल पांच बार आयोजित किया जाता है, जिसमें लोहारू व बरालू सहित आसपास के गांवों के साथ-साथ राजस्थान और हरियाणा से भी ऊंट व्यापारी पहुंचते हैं। यह मेला सरकार द्वारा लोहारू बीडीपीओ कार्यालय के अधीन आयोजित किया जाता है।
इस वर्ष मेले के सफल आयोजन के लिए महेंद्र सिंह, सुरेश कुमार, राजवीर सिंह (क्लर्क), महिपाल (अकाउंटेंट), रिंकू प्रजापत सहित अन्य कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है। प्रशासन की देखरेख में यह मेला करीब तीन दिन तक चलता है, जिसमें ऊंटों की खरीद-बिक्री के साथ-साथ ऊंटों से जुड़े विभिन्न पारंपरिक कार्य भी होते हैं।
मेले में पहुंचे ऊंट व्यापारियों रामचंद्र, जितेंद्र, राजेश श्योराण, रवि, प्रेम व रोहताश आदि ने बताया कि वे कई वर्षों से इस मेले में आते रहे हैं। पहले इस मेले में भारी संख्या में ऊंट और खरीदार आते थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। वर्तमान समय में गिने-चुने ऊंट और व्यापारी ही नजर आते हैं, जो इस परंपरा के भविष्य को लेकर चिंता पैदा करता है।
व्यापारियों ने बताया कि ऊंट को ‘मरुस्थल का जहाज’ कहा जाता है। यह ऐसा जीव है जो बिना खाए-पिए कई दिनों तक रह सकता है और रेगिस्तानी इलाकों में तेज दौड़ लगाने की क्षमता रखता है। पहले ऊंटों का उपयोग विवाह-शादी, कृषि कार्य, सामान ढोने और लंबी यात्राओं में बड़े पैमाने पर किया जाता था। लेकिन आधुनिक युग में मशीनरी के बढ़ते प्रयोग के कारण ऊंटों की उपयोगिता कम होती चली गई, जिसका सीधा असर उनकी संख्या पर पड़ा है।
व्यापारियों का कहना है कि आज की नई पीढ़ी को ऊंटों के महत्व और उनकी उपयोगिता की जानकारी तक नहीं है। ऐसे में यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होने की कगार पर पहुंच रही है। उन्होंने सरकार और प्रशासन से मांग की कि ऊंटों के संरक्षण और उनकी संख्या बढ़ाने के लिए विशेष योजनाएं चलाई जाएं, ताकि यह सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित रह सके।
वहीं, मेले में वर्षों से दुकानदारी कर रहे दुकानदार प्रेम ने बताया कि वे लंबे समय से ऊंटों की जरूरत का सामान और ऊंटों के श्रृंगार से जुड़ी वस्तुएं बेचते आ रहे हैं। पहले मेले में अच्छा व्यापार होता था, लेकिन अब हालत यह है कि मुश्किल से रोज़मर्रा का खर्च निकल पाता है। ऊंटों की घटती संख्या का सीधा असर छोटे दुकानदारों की रोज़ी-रोटी पर भी पड़ रहा है।
इस तीन दिवसीय मेले में कई लोग ऊंटों की खरीद-बिक्री करते हैं, तो कई लोग ऊंटों पर पारंपरिक लेख (लिखावट) और डिजाइन भी करवाते हैं, जो इस मेले की एक विशेष पहचान रही है। कुल मिलाकर यह मेला केवल व्यापार का माध्यम नहीं, बल्कि क्षेत्र की संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन से गहराई से जुड़ा हुआ है।
स्थानीय लोगों और व्यापारियों का मानना है कि यदि समय रहते ऊंटों के संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह ऐतिहासिक ऊंट मेला केवल यादों तक ही सीमित रह जाएगा।
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