पद्म विभूषण पंडित जसराज के निधन के बाद सोमवार को पहली बार उनकी पुत्री दुर्गा जसराज अपने पिता के पैतृक गांव पीलीमंदोरी पहुंचीं। पिता की जन्मस्थली की मिट्टी को नमन करते ही वे भावुक हो गईं और पुरानी स्मृतियों में खो गईं। पंडित जसराज के बड़े भाई मनीराम पंडित का परिवार आज भी गांव में निवास करता है। दुर्गा जसराज ने अपने चचेरे भाई रामकुमार पंडित और उनके परिवार से मुलाकात कर हालचाल जाना। इसके बाद वे रामकुमार के साथ गांव की मुख्य सड़क से लगभग 500 मीटर अंदर स्थित तंग गली में बने करीब 150 गज के पैतृक मकान पहुंचीं, जहां पंडित जसराज का जन्म हुआ था। घर की दीवारों पर सजी यादों के बीच उनकी नजर लगभग 95 वर्ष पुरानी एक तस्वीर पर पड़ी, जिसमें नन्हें जसराज अपने पिता पंडित मोतीराम की गोद में बैठे नजर आ रहे हैं। इस तस्वीर को देखकर दुर्गा जसराज भावुक हो उठीं और पिता के बचपन की यादों को ताजा किया। वे तस्वीर में दिख रहे हर व्यक्ति के बारे में उत्सुकता से पूछती रहीं, जिस पर परिजनों ने किसी को बुआ, किसी को ताऊ-ताई और चाचा बताया। दुर्गा ने वह समय भी याद किया जब वे पहली बार अपने पिता के साथ गांव आई थीं। इस बार पिता के बिना गांव आना उनके लिए बेहद भावुक क्षण था।
भजन गायक अनूप जलोटा को अपने संस्मरण सुनाते हुए दुर्गा ने बताया कि उनके पिता कहा करते थे कि जब भी पीलीमंदोरी जाओ, सबसे पहले गांव की मिट्टी को प्रणाम करना। अनूप जलोटा भी दुर्गा जसराज के साथ पंडित जसराज के पैतृक घर पहुंचे। उन्होंने कहा कि पंडित जसराज मां सरस्वती के सच्चे पुत्र थे। जिस प्रकार हरियाणा की धरती पर भगवान कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया, उसी तरह पंडित जसराज ने यहां जन्म लेकर दुनिया को संगीत का अमूल्य उपदेश दिया। उन्होंने कहा कि पैतृक घर आकर स्वयं को धन्य महसूस कर रहा हूं और यह अनुभव अलौकिक है। पुरानी यादें साझा करते हुए अनूप जलोटा ने बताया कि पंडित जसराज उन्हें स्नेह से ‘जवाईं राजा’ कहा करते थे, क्योंकि उनकी पत्नी ने कुछ समय तक उनसे शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली थी। इसी कारण जीवन भर उनके साथ आत्मीय संबंध बना रहा।