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Allegations of embezzlement of crores of rupees in the process of fixing rates for hundreds of acres of land in the logistics hub
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नारनौल: लॉजिस्टिक हब की सैकडों एकड़ जमीन के रेट तय करने की प्रक्रिया में करोड़ों रुपए के गबन का आरोप
सामाजिक कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविद् इंजीनियर तेजपाल यादव ने नारनौल में आयोजित प्रेस वार्ता में लॉजिस्टिक हब के लिए अधिग्रहण की गई जमीन में अनियमितता व गबन करने का आरोप लगाया है।
उन्होंने कहा कि बशीरपुर के किसानों की भूमि 30 लाख रुपए प्रति एकड़ की दर से प्रत्यक्ष खरीद/रजिस्ट्री के माध्यम से ली गई, यह प्रक्रिया उस समय अपनाई गई जब भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 पूर्ण रूप से लागू था। इंजी. तेजपाल यादव ने कहा कि इस लॉजिस्टिक हब की पृष्ठभूमि ही बहुत बड़े सवाल खड़ी करती है कि जब 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून जब लागू था तो फिर किसानों से एक कागज पर दबाव डालकर हस्ताक्षर करवा कर जमीन खरीदने की रजिस्ट्री करवाने की प्रक्रिया क्यों अपनानी पड़ी?
दस्तावेजों से स्पष्ट है कि 30 लाख रुपए प्रति एकड़ की दर किसानों द्वारा तय नहीं की गई थी बल्कि उपायुक्त की अध्यक्षता वाली कमेटी द्वारा पहले से प्रस्तावित की गई थी। किसानों को केवल इस प्रस्तावित दर पर सहमति जताने के लिए बुलाया गया! इसे स्वतंत्र मोलभाव या निष्पक्ष सहमति नहीं कहा जा सकता। किसानों की जमीनों की रेट तय करने की प्रक्रिया में बनी समिति के 6 सदस्य थे जिसमें नांगल चौधरी के भाजपा विधायक डॉक्टर अभय सिंह यादव प्रमुख भूमिका में थे।
सरकारी रिकॉर्ड में यह दर्ज है कि कई किसानों ने जमीनों के रेट के संबंध में आपत्तियां दर्ज की थी। इसके बावजूद न तो उन्हें व्यक्तिगत सुनवाई दी गई और ना ही उनकी आपत्तियों को खारिज करने का कोई लिखित कारणयुक्त आदेश पारित किया गया। यदि वास्तव में सहमति थी तो आपत्तियों को दबाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?
इंजी. तेजपाल यादव ने कहा कि इसमें सबसे रोचक तथ्य यह है कि जब लॉजिस्टिक हब की जमीनों के लिए उचित रेट का मुआवजे का हवाला देकर किसानों को हस्ताक्षर करवाया गया, उसमें से कुछ किसान ऐसे भी थे जिनसे जबरदस्ती उन पर दबाव डालकर हस्ताक्षर करवाए गए और उन किसानों ने जमीन के रेट को लेकर बाद में आपत्तियां भी डाली, जिन आपत्तियों पर कोई सुनवाई नहीं की गई।
जबकि आपत्तियों को पूर्ण तरीके से नजरअंदाज करके ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
जमीनों की रेट तय करने की समिति में जिला उपायुक्त, विधायक, सांसद एवं एचएसआईआईडीसी के अधिकारी शामिल थे, परंतु एक भी किसान या किसान प्रतिनिधि को सदस्य नहीं बनाया गया जिस भूमि का सौदा था उसके वास्तविक मालिकों को ही निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
इंजी. तेजपाल यादव ने प्रेस वार्ता में आरोप लगाया कि स्थानीय विधायक डॉक्टर अभय सिंह यादव ना केवल जमीनों के रेट तय करने की समिति में शामिल थे, बल्कि सहमति प्रक्रिया और क्रियान्वयन में भी उनकी भूमिका रही। विधायक का कार्य केवल समन्वय तक सीमित होना चाहिए था, ना की रेट तय करने या सहमति थोपने का। यह स्थिति गंभीर हितों के टकराव की ओर संकेत करती है। विधायक डॉक्टर अभय सिंह यादव को पता था कि अगर 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार अगर इन किसानों की जमीन लॉजिस्टिक हब के लिए खरीदी जाती है तो किसानों को मुआवजा न्यूनतम 66 से 80 लाख रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से देना पड़ेगा। इसलिए उन्होंने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार जमीनें ना लेकर, 30 लाख रुपए प्रति एकड़ के रेट से डायरेक्ट रजिस्ट्री के माध्यम से जमीन ली गई। उन्होंने सीबीआई से जांच करने की मांग की।
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