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Bilaspur: बिलासपुर में यूजीसी के इक्विटी विनियमों के विरोध में सवर्ण समाज ने किया प्रदर्शन
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की ओर से हाल ही में अधिसूचित समता इक्विटी से जुड़े विनियमों को लेकर बिलासपुर जिला में सामान्य वर्ग के संगठनों ने विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया है। सवर्ण समाज सामान्य वर्ग संयुक्त मंच हिमाचल प्रदेश की जिला इकाई ने केंद्र सरकार के इस यूजीसी कानून के खिलाफ नारेबाजी करने के बाद उपायुक्त राहुल कुमार को ज्ञापन सौंपा। इससे पहले यूजीसी कानून को लेकर धरना प्रदर्शन करके परिधि गृह से लेकर उपायुक्त कार्यालय तक रैली निकाली और केंद्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी कर रोष प्रकट किया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के ये नए विनियम उच्च शिक्षा में अध्ययनरत सामान्य वर्ग के छात्रों के भविष्य के लिए गंभीर रूप से नुकसानदायक हैं। इस बैठक में शिक्षाविदों, भूतपूर्व सैनिक अधिकारियों, विभिन्न विभागों के सेवानिवृत्त कर्मचारियों और सामाजिक प्रतिनिधियों ने एक स्वर में चिंता व्यक्त की। सामान्य वर्ग संयुक्त मंच हिमाचल प्रदेश बिलासपुर इकाई के अध्यक्ष विजय चंदेल और सदस्य रमेश कुमार ने कहा कि इन विनियमों से न केवल अकादमिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी, बल्कि विभिन्न छात्र संंगठनों के बीच आपसी एकता और सामाजिक संतुलन भी कमजोर पड़ेगा। उन्होंने आशंका जताई कि यह स्थिति 1990 में मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के समय जैसी बन सकती है, जब हजारों युवाओं का भविष्य प्रभावित हुआ था। मंच का कहना है कि सामान्य वर्ग को अपेक्षा थी कि सरकार जाति आधारित आरक्षण के स्थान पर आर्थिक आधार को प्राथमिकता देगी और एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएगी, लेकिन इसके विपरीत शिक्षा क्षेत्र में नए और कठोर नियम लागू कर दिए गए। संगठनों ने आरोप लगाया कि इक्विटी कमेटियों में सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व न होना पक्षपात को दर्शाता है। प्रदर्शनकारियों ने यह भी आशंका जताई कि विनियमों में दुरुपयोग रोकने के प्रभावी प्रावधान नहीं होने से इन्हें व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्र-छात्राएं मानसिक दबाव में रहेंगे। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि सामान्य वर्ग के सभी शीर्ष संगठन मिलकर जिला प्रशासन के माध्यम से महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री, केंद्रीय शिक्षा मंत्री और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन सौंपेंगे। ज्ञापन में इन विनियमों को अन्यायपूर्ण बताते हुए तत्काल प्रभाव से वापस लेने की मांग की जाएगी। यदि यह कानून लागू किया, तो विश्वविद्यालय परिसरों में शिक्षा, रोजगार और शैक्षणिक गुणवत्ता जैसे साझा मुद्दे हाशिए पर चले जाएंगे और समावेशी छात्र राजनीति कमजोर होगी। संगठन ने राष्ट्रपति से शीघ्र हस्तक्षेप कर केंद्र सरकार से इन विनियमों को वापस लेने की अपील की है।
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