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Azam Khan, released from Sitapur jail, may have to go to jail again?
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सीतापुर जेल से रिहा हुए आजम खान को फिर जाना पड़ सकता है जेल?
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: आदर्श Updated Wed, 24 Sep 2025 11:25 AM IST
क्या समाजवादी पार्टी (सपा) के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री आजम खां की मुश्किलें खत्म होने का नाम ले रही हैं या हर रिहाई के बाद एक नया संकट उनका इंतजार कर रहा है? सीतापुर जेल से बाहर निकलने के बाद रामपुर पहुंचे आजम खां के चेहरे पर भले ही मुस्कान थी, लेकिन कानूनी लड़ाई की तलवार अब भी उन पर लटक रही है।
करीब 50 महीने जेल की सलाखों के पीछे वक्त गुजारने वाले आजम खां मंगलवार को सीतापुर से रिहा होकर रामपुर लौटे। समर्थकों की भीड़ और कार्यकर्ताओं के नारों के बीच उन्होंने बाहर कदम रखा। लेकिन यह आजादी अधूरी सी है, क्योंकि अब भी 59 मामले सेशन कोर्ट और 19 मामले मजिस्ट्रेट कोर्ट में लंबित हैं। कुल 104 मामलों में फंसे आजम खां को 12 मामलों में अब तक फैसला मिला है जिनमें पांच में सजा और सात में बरी।
तीन मामले फैसले की दहलीज पर
सबसे अहम तीन मामले अब कोर्ट के निर्णायक मोड़ पर हैं।
1. भड़काऊ भाषण मामला (2019 लोकसभा चुनाव)
आरोप है कि चुनाव प्रचार के दौरान आजम खां ने मतदाताओं को पुलिस के खिलाफ भड़काया और मतदान अवधि खत्म होने के बाद भी वोट डालने को उकसाया। यह मामला आचार संहिता उल्लंघन से जुड़ा है और फैसला किसी भी दिन आ सकता है।
2. अमर सिंह परिवार पर आपत्तिजनक टिप्पणी
वर्ष 2018 में एक इंटरव्यू के दौरान अमर सिंह और उनके परिवार पर की गई टिप्पणी ने बड़ा विवाद खड़ा किया था। अमर सिंह ने खुद लखनऊ में केस दर्ज कराया था, जो बाद में रामपुर स्थानांतरित हो गया। यह मामला भी एमपी-एमएलए कोर्ट में अंतिम चरण में है।
3. सेना पर विवादित टिप्पणी
भाजपा विधायक आकाश सक्सेना की शिकायत पर दर्ज यह केस आजम खां के खिलाफ गंभीर माना जा रहा है। आरोप है कि उन्होंने सरकार विरोधी भाषण के दौरान सेना पर भी आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। तीनों मामलों में बहस पूरी हो चुकी है और अब कोर्ट के आदेश का इंतजार है।
शत्रु संपत्ति से जुड़े एक मामले में आजम खां को एमपी-एमएलए कोर्ट ने 1 अक्तूबर को व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने के आदेश दिए हैं। पुलिस ने इस केस में तीन धाराएं और जोड़ दी हैं। बचाव पक्ष का कहना है कि धाराओं के विस्तार पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, इसलिए उन्हें फिलहाल कस्टडी में नहीं लिया गया।
आजम खां के खिलाफ यतीमखाना बस्ती विवाद और किसानों की जमीन कब्जाने से जुड़े मामलों की सुनवाई भी जारी है। 25 सितंबर को गवाहों से जिरह होनी है। बचाव पक्ष और अभियोजन दोनों की दलीलों पर अदालत बारीकी से नजर रखे हुए है।
आजम खां का ड्रीम प्रोजेक्ट मौलाना अली जौहर विश्वविद्यालय भी जांच के घेरे में है। आयकर विभाग ने दो साल पहले देशभर में 30 ठिकानों पर छापा मारकर करीब 350 करोड़ रुपये की वित्तीय गड़बड़ी उजागर की थी। आरोप है कि ट्रस्ट ने निर्माण में खर्च हुई रकम का स्रोत नहीं बताया। इसके बाद 550 करोड़ रुपये की रिकवरी की प्रक्रिया भी शुरू की गई।
ईडी ने भी विवि और आजम खां के परिवार पत्नी तंजीन फात्मा और बेटे अब्दुल्ला आजम की संपत्तियों की जांच की। साथ ही कई आर्किटेक्ट, ठेकेदार और अधिकारी भी इस जांच की जद में आए। हालांकि अब तक विश्वविद्यालय को औपचारिक रूप से जब्त नहीं किया गया है।
आजम खां समाजवादी राजनीति का बड़ा नाम रहे हैं। जेल से रिहाई के बाद भी उनके खिलाफ लगातार जारी मुकदमों ने उनके राजनीतिक भविष्य पर धुंध डाल दी है। एक ओर वे अपने समर्थकों के बीच “अन्याय के शिकार” नेता के रूप में पेश किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर कोर्ट के फैसले और जांच एजेंसियों की कार्रवाई उनका सियासी सफर कठिन बना रही है।
1 अक्तूबर की पेशी और तीन अहम मामलों में आने वाले फैसले यह तय करेंगे कि आजम खां का राजनीतिक और व्यक्तिगत भविष्य किस दिशा में जाएगा। समर्थकों को उनकी बेगुनाही का भरोसा है, लेकिन विपक्षी दल इन्हीं मामलों को सियासी हथियार बनाकर उन्हें घेर रहे हैं।
रामपुर की गलियों से लेकर लखनऊ और दिल्ली की सियासत तक हर किसी की नजर अब अदालतों के दरवाजे पर टिकी है। सवाल यही है क्या आजम खां कानूनी जाल से निकलकर राजनीति में वापसी कर पाएंगे या फिर ये मुकदमे उनके लिए नया संकट साबित होंगे?
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