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Shibu Soren Passed Away: Shibu Soren is no more, how did he become the 'Guruji' of Jharkhand from a tribal lea
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Shibu Soren Passed Away: नहीं रहे Shibu Soren,आदिवासी नेता से कैसे बने Jharkhand के ‘गुरुजी’?
वीडियो डेस्क, अमर उजाला Published by: तन्मय बरनवाल Updated Mon, 04 Aug 2025 12:16 PM IST
झारखंड की राजनीति के सबसे बड़े चेहरे और झारखंड अलग राज्य आंदोलन के अगुआ शिबू सोरेन का सोमवार को दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में निधन हो गया। वे 81 साल के थे। उनके निधन की खबर से झारखंड में शोक की लहर दौड़ गई है। लोग उन्हें प्यार से "गुरुजी" कहकर बुलाते थे। शिबू सोरेन सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि एक आंदोलनकारी थे जिन्होंने आदिवासी समाज के हक और सम्मान के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष किया। शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड के रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने देखा कि कैसे आदिवासी समाज के लोगों का शोषण होता है। इसी अन्याय के खिलाफ उन्होंने 1960 के दशक में आवाज उठानी शुरू की। 1970 के दशक में उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की। उनका मुख्य मकसद अलग झारखंड राज्य बनवाना था। इसके लिए उन्होंने जल, जंगल और जमीन के हक में आंदोलन शुरू किया। 1980 में शिबू सोरेन पहली बार लोकसभा सांसद बने। इसके बाद वे कई बार सांसद बने और संसद में आदिवासी समाज की समस्याओं को जोरदार तरीके से उठाया। शिबू सोरेन की मेहनत और आंदोलन के कारण ही साल 2000 में झारखंड को बिहार से अलग करके एक नया राज्य बनाया गया। यह राज्य 15 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया। शिबू सोरेन की पहचान सिर्फ एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि एक जननायक के रूप में रही है जिन्होंने आदिवासी अस्मिता को पहचान दिलाई।
शिबू सोरेन तीन बार (2005, 2008 और 2009) झारखंड के मुख्यमंत्री बने। उनके कार्यकाल के दौरान आदिवासी कल्याण योजनाओं और विकास कार्यों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया, हालांकि राजनीतिक अस्थिरता के कारण ये कार्यकाल लंबे समय तक नहीं चल सके। उनके राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए। भ्रष्टाचार और हत्या जैसे गंभीर आरोप भी लगे, हालांकि कई मामलों में वे अदालत से बरी भी हुए। इसके बावजूद वे झारखंड की राजनीति में एक मजबूत जननेता के रूप में पहचाने जाते हैं। शिबू सोरेन, जिन्हें लोग स्नेहपूर्वक "गुरुजी" कहते हैं, ने अपना पूरा जीवन आदिवासी अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई को समर्पित कर दिया। उनका जन्म 11 जनवरी 1944 को तत्कालीन बिहार (अब झारखंड) के बोकारो जिले के नेमरा गांव में हुआ। बचपन से ही उन्होंने आदिवासी समाज पर हो रहे शोषण और जमीन छीने जाने की घटनाओं को नजदीक से देखा।
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