भीषण गर्मी में पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसती सीहोर जिले की महिलाएं अब सड़कों पर उतर आई हैं। जब घर की मटकी सूख जाए और उम्मीदें भी जवाब दे दें, तब आक्रोश आंदोलन में बदल जाता है। यही तस्वीर इन दिनों मानपुरा, जमनी, अमरोद और पचामा गांवों में देखने को मिल रही है।
गांवों में लगे अधिकांश हैंडपंप या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या उनमें से नाम मात्र का पानी निकल रहा है। महिलाओं को रोजाना 3 से 4 किलोमीटर दूर खेतों के ट्यूबवेल और कुओं से पानी ढोना पड़ रहा है। यह संघर्ष केवल प्यास बुझाने का नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी को बचाए रखने का बन चुका है।
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लाडली बहना का पैसा भी प्यास में खर्च
महिलाओं का दर्द सिर्फ पानी तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि सरकार से मिलने वाली ‘लाडली बहना’ योजना की राशि भी अब पानी के इंतजाम में खर्च हो रही है। दिनभर पानी जुटाने में लगने के कारण वे मजदूरी भी नहीं कर पा रहीं, जिससे आर्थिक संकट और गहरा गया है।
पुतला बनाकर जताया गुस्सा
चार दिनों से जारी आंदोलन अब उग्र रूप ले चुका है। महिलाओं ने पीएचई विभाग के अधिकारी का पुतला बनाकर उसे हैंडपंप से बांध दिया, वहीं एक अन्य पुतले को पेड़ से टांगकर विरोध जताया। ग्रामीणों का आरोप है कि एक से डेढ़ महीने पहले ही नलकूप खनन की मांग की जा चुकी है। समाजसेवी एमएस मेवाड़ा के नेतृत्व में किसान और ग्रामीण भोपाल तक पहुंचे, मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर पीएचई मंत्री तक गुहार लगाई गई। आदेश भी जारी हुए, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
मटका फोड़ से उग्र आंदोलन तक
शुरुआत में महिलाओं ने मटका फोड़कर अपना विरोध जताया, फिर तख्तियां लेकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। लेकिन जब सुनवाई नहीं हुई, तो आंदोलन उग्र होता गया और अब पुतला टांगने तक पहुंच गया है। महिलाओं ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही नलकूप नहीं खोदे गए, तो आंदोलन और तेज होगा। इस आंदोलन में अनसूया बाई मेवाड़ा, कलावती कुशवाहा, पूजा कुशवाहा, ताराबाई बैरागी सहित दर्जनों महिलाएं शामिल हैं। ये महिलाएं अब सिर्फ अपने घरों के लिए नहीं, बल्कि पूरे गांव की प्यास बुझाने के लिए एकजुट होकर लड़ाई लड़ रही हैं। उनकी आवाज अब प्रशासन तक पहुंचने का इंतजार कर रही है। इस संबंध में एसडीएम तन्मय वर्मा ने कहा कि मामले में जानकारी मंगवाई गई है। ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान कराया जाएगा।

पानी के लिए सड़कों पर उतरीं महिलाएं
पुतला लगाकर विरोध जताया