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Ken-Betwa Link Project: जहां PM मोदी ने केन-बेतवा लिंक का भूमिपूजन किया, वहां ग्रामीण विरोध कर चिता पर लेटे

न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, छतरपुुर Published by: अरविंद कुमार Updated Wed, 25 Dec 2024 07:18 PM IST
Chhatarpur Where PM Modi performed Bhoomi Pujan of Ken-Betwa Link villagers protested and lay down on pyre

केन-बेतवा लिंक परियोजना का भूमिपूजन/शिलान्यास से नाराज ग्रामीण और प्रभावितों ने आज के दिवस को काला दिवस मनाया और परियोजना स्थल पर ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर जंगल की लकड़ी बटोरकर उसकी चिता बनाकर और जलाकर उस पर लेटकर प्रदर्शन किया। वहीं ग्रामीणों/प्रभावितों ने अपना दर्द बयां कर कहा कि हमने अपना सब कुछ खो दिया, पर फिर भी हमारे साथ अन्याय क्यों हो रहा है?

बता दें कि एक तरफ प्रधानमंत्री के हाथों केन-बेतवा लिंक का शिलान्यास तो वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण/प्रभावित काला दिवस के रूप में मना रहे थे। यहां केन-बेतवा लिंक के शिलान्यास से नाराज प्रभावितों ने आज के दिन को काला दिवस के रूप में मनाते हुए परियोजना स्थल पर ही जंगल की लकड़ी बटोरकर उसकी चिता बनाई और उस पर आग लगाकर लेट गए। आंदोलन करने वाले अमित भटनागर की माने तो 46 लाख पेड़, 22 गांव मिट जाएंगे। यहां कानून, सुप्रीम कोर्ट और NGT के सुझाव की अनदेखी की गई है। यह योजना विकास नहीं विनाश लाएगी। बुंदेलखंड के जल संकट का स्थाई हल पारंपरिक जल स्रोतों और जल संचयन, 46 लाख पेड़ और जंगल उजाड़ने से विनाश होगा।

'जल संकट का स्थाई हल पारंपरिक जल स्रोत और जल संचयन'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना के शिलान्यास से नाराज आदिवासी और ग्रामीणों ने काला दिवस मनाया। सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर के नेतृत्व में प्रभावित लोग दौधन बांध के निर्माण स्थल पर बड़ी संख्या में एकत्र हुए और सांकेतिक चिता बनाकर उस पर लेट कर प्रदर्शन किया। ग्रामीणों का कहना है कि इस परियोजना ने उनके जीवन, माटी और आजीविका को नष्ट कर दिया है। उन्होंने परियोजना के लिए अपने खेत, घर और सांस्कृतिक पहचान का त्याग किया। लेकिन बदले में उन्हें फर्जी ग्राम सभाओं, लाठीचार्ज और भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा।

'हमने सब कुछ खो दिया, पर हमारे साथ अन्याय क्यों'?
22 गांवों के आदिवासी और ग्रामीण, जिनकी जमीन, माटी और आजीविका इस परियोजना के कारण छीन ली गई, ने प्रधानमंत्री से सवाल किया...

त्याग के बदले बर्बरता क्यों? हमने अपनी जमीन और पहचान खो दी। हमें सहानुभूति और सम्मान मिलना चाहिए था, लेकिन हमें फर्जी ग्राम सभाओं और लाठीचार्ज का सामना करना पड़ा।  

फर्जी ग्राम सभाओं का सहारा क्यों? पंचायती राज अधिनियम और भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत ग्रामीणों की सहमति आवश्यक थी। लेकिन फर्जी ग्राम सभाओं के माध्यम से सहमति का झूठा दावा किया गया।

पुनर्वास और मुआवजा क्यों नहीं? हमारी जमीन सरकार ने ले ली, लेकिन न मुआवजा मिला और न पुनर्वास। मुआवजे में भ्रष्टाचार हुआ और हमारी आवाज को दबा दिया गया। 

लाठीचार्ज और दमन क्यों? शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पर हमें रात में लाठीचार्ज का सामना करना पड़ा। क्या यही लोकतंत्र है?

46 लाख पेड़ और 22 गांव उजाड़े जा रहे
सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने कहा कि यह परियोजना न केवल 46 लाख पेड़ों की कटाई और पन्ना टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र को नष्ट करेगी। बल्कि 22 गांवों के आदिवासी और ग्रामीण समुदायों को उनकी पहचान और अधिकारों से वंचित कर रही है। यह परियोजना विकास नहीं, बल्कि विनाश का प्रतीक बन चुकी है। मोदी ने इस विवादित परियोजना का शुभारंभ कर प्रधानमंत्री जैसे गरिमामयी पद की गरिमा को ठेस पहुंचाई है।

पर्यावरणीय और विधिक उल्लंघन
अमित भटनागर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल किया कि जब परियोजना सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में विचाराधीन है, तब निर्णय आए बिना जनता के पैसे को बर्बाद क्यों किया जा रहा है?

केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) की रिपोर्ट
जैसा कि भाजपा और प्रधानमंत्री प्रचारित कर रहे हैं। अगर यह परियोजना इतनी लाभकारी है तो सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्मित केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) की रिपोर्ट में परियोजना को पर्यावरणीय और सामाजिक दृष्टिकोण से विनाशकारी क्यों बताया जा रहा?

झूठे जलविज्ञान के आंकड़े
सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) की रिपोर्ट को आधार बताते हुए बताया कि परियोजना के तहत यह दावा किया गया कि केन नदी में जल अधिक है।लेकिन यह दावा झूठा और अप्रमाणिक है।

अमित भटनागर ने परियोजना सहित प्रधानमंत्री पर कई सवाल खड़े किए

बुंदेलखंड के जल संकट का समाधान झूठा दावा: 
यह परियोजना बुंदेलखंड के पानी को अन्य क्षेत्रों में निर्यात करेगी और यहां की जल समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी। बुंदेलखंड की जल संकट का स्थाई समाधान पारंपरिक जल स्रोतों और 46 लाख पेड़ों को बचाने में है।

प्रदर्शनकारियों की मांगें: परियोजना पर रोक- जब तक सुप्रीम कोर्ट और NGT का अंतिम निर्णय नहीं आता, परियोजना का काम रोका जाए।

फर्जी ग्राम सभाओं की जांच: स्वतंत्र एजेंसी से ग्राम सभाओं और सहमति के झूठे दावों की जांच कराई जाए।

पुनर्वास और मुआवजा: सभी प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा और पुनर्वास दिया जाए। मुआवजे में हुई अनियमितताओं के दोषियों पर कार्रवाई की जाए।

पर्यावरणीय और सामाजिक समीक्षा: केंद्रीय सशक्त समिति (CEC) की रिपोर्ट के आधार पर परियोजना की पुनः समीक्षा की जाए।

ग्रामीणों की चेतावनी, विरोध जारी रहेगा
प्रभावितों ने स्पष्ट किया कि यदि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो उनका विरोध और तेज होगा। परियोजना की वास्तविकता और इसके विनाशकारी प्रभावों को देश भर में उजागर किया जाएगा। प्रदर्शनकारीयों का कहना था कि हम शांतिपूर्ण आंदोलन करेंगे। लेकिन अपने अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा के लिए लड़ाई जारी रखेंगे। परियोजना प्रभावित धोड़न गांव के गौरीशंकर यादव ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि यह लड़ाई हम सबके अधिकारों की ही नहीं है। बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य बचाने की भी है।

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