राजस्थान के रेगिस्तानी जिले बाड़मेर में पर्यावरण संरक्षण और धार्मिक आस्था का अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। यहां बने माजीसा धाम मंदिर ने पर्यावरण प्रेम का जीता-जागता उदाहरण पेश किया है। मंदिर निर्माण के दौरान खेजड़ी के पेड़ को बचाने के लिए पूरा मंदिर का नक्शा बदल दिया गया और लाखों रुपये अतिरिक्त खर्च किए गए। यह घटना राज्यभर में खेजड़ी संरक्षण के मुद्दे पर एक सकारात्मक संदेश बनकर उभरी है।
पैसा खर्च करना था मंजूर लेकिन पेड़ काटना नहीं
बाड़मेर के जूना केराड़ू मार्ग पर स्थित माजीसा धाम मंदिर के निर्माण के समय भामाशाहों द्वारा खरीदी गई जमीन पर एक खेजड़ी का पेड़ खड़ा था। मंदिर ट्रस्ट और निर्माण समिति ने इसे काटने के बजाय बचाने का निर्णय लिया। पहले मंदिर के ब्लूप्रिंट और लेआउट में बदलाव किया गया ताकि पेड़ बीच में न आए। फिर विभिन्न उपकरणों और तकनीकी मदद से आसपास की जमीन की खुदाई की गई, जिससे पेड़ की जड़ें सुरक्षित रह सकीं। इस प्रक्रिया में लगभग 15 से 20 लाख रुपये अतिरिक्त खर्च हुए। कुल मंदिर निर्माण पर करीब 5 करोड़ रुपये खर्च हुए, लेकिन यह अतिरिक्त व्यय पर्यावरण प्रेम का प्रतीक बन गया।
पेड़ अब मंदिर की पहचान
मंदिर ट्रस्ट के सदस्य सुरेश ने बताया, 'निर्माण कार्य की शुरुआत में बबूल की झाड़ियों के बीच यह खेजड़ी का पेड़ मिला। हमने इसे काटने का फैसला नहीं किया और पेड़ को सुरक्षित रखते हुए निर्माण कार्य शुरू किया। मंदिर की नींव भरने के लिए 15 फीट तक गहराई में खुदाई की गई। खेजड़ी को सुरक्षित रखने के लिए तीन दिन तक हाइड्रो मशीन और अन्य तकनीकी साधनों का उपयोग किया गया। यह पेड़ अब मंदिर की पहचान बन गया है और लोग इसे 'खेजड़ी वाला माजीसा मंदिर' के नाम से भी जानते हैं।'
'खेजड़ी बचाने के लिए बिश्नोई समाज ने दिया बलिदान'
उन्होंने कहा कि बिश्नोई समाज के लोगों ने खेजड़ी को बचाने के लिए अपना बलिदान भी दिया है। वर्तमान में बीकानेर में खेजड़ी बचाओ आंदोलन जारी है और लोग इसके संरक्षण के लिए कानून बनाने की मांग कर रहे हैं।
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'खेजड़ी राजस्थान की संस्कृति का भी प्रतीक'
वहीं, मंदिर ट्रस्ट के दूसरे सदस्य कुंदनमल जैन ने बताया, 'माजीसा धाम पर आने वाले श्रद्धालु न केवल माता के दर्शन करते हैं, बल्कि खेजड़ी से भी गहरी आस्था रखते हैं। लोग इसके दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं। खेजड़ी केवल पर्यावरण का प्रतीक नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और राजस्थान की संस्कृति का भी प्रतीक है। इसे तुलसी के समान माना जाता है। अगर ऐसे प्रयास जारी रहें, तो हमारा रेगिस्तान भी हरा-भरा रह सकता है।'