{"_id":"69789113f8d75811f70580d9","slug":"video-jhansi-the-national-poets-village-is-not-listed-on-the-literary-tourism-map-2026-01-27","type":"video","status":"publish","title_hn":"झांसी: साहित्यिक पर्यटन के नक्शे पर दर्ज नहीं राष्ट्रकवि का गांव","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
झांसी: साहित्यिक पर्यटन के नक्शे पर दर्ज नहीं राष्ट्रकवि का गांव
झांसी ब्यूरो
Updated Tue, 27 Jan 2026 03:48 PM IST
Link Copied
राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की जन्मभूमि। साकेत, यशोधरा जैसी काव्य रचनाओं की साधना स्थली। हिंदी साहित्य जगत में बड़ा नाम गौरवशाली सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत, लेकिन चिरगांव को कवि गांव बनाने का सपना अूधरा है। डिजिटल युग में हजारों किताबें उनकी हवेली के बंद कमरों में धूल फांक रही हैं। पांडुलिपियों समेत कई स्मृतियां धूमिल हो रही हैं। हवेली को लेखकों का इंतजार है। आजादी से पहले यहां साहित्य सदन नामक जिस प्रेस से राष्ट्रभावना बहती थी, उसका नामोनिशान तक नहीं है। यह वही छापाखाना था, जहां से खड़ी बोली में स्वाधीनता का स्वर जन-जन तक पहुंचा लेकिन दशकों पहले ये मशीनें खामोश हो गईं। अब उनकी किताबें दिल्ली में छपती हैं। कभी यह देश की मुक्ति में योगदान देने वाले लेखकों के विचारों का केंद्र रहा, लेकिन अब कोई लेखक यहां रहकर साहित्य सृजन नहीं करता। बताया जाता है कि पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने यहां आकर तीन साल पहले चिरगांव को कवि गांव बनाने की घोषणा की थी और सहयोग देने की बात कही थी। इसके बावजूद यह गांव साहित्यिक पर्यटन के नक्शे पर मजबूती से दर्ज नहीं हो पाया है। इस मिट्टी ने उस कवि को गढ़ा, जिसने राष्ट्रबोध जगाया और मानव मूल्यों को कविता का प्राण बनाया। उनके योगदान के लिए सन् 1955 में तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें पद्म भूषण से नवाजा। 3 अगस्त 1986 को दद्दा के जन्म शताब्दी समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति आर वेंकटरमन भी उनकी समाधि पर शीश नवाने पहुंचे। राष्ट्रकवि की हवेली में पद्म भूषण पुरस्कार, डाक टिकट समेत कई धरोहरें सहेज कर रखी गई हैं। उनकी इस विरासत को 30 साल से देखरेख कर रहे राम प्रकाश गुप्ता बताते हैं कि मैथिली शरण गुप्त यानी दद्दा की स्मृतियों और साहित्य को सहेजने के लिए हवेली का एक हिस्सा राजकीय संग्रहालय को देने के लिए उनके पाैत्र साैरभ गुप्ता और डा. वैभव गुप्ता ने स्वीकृति प्रदान है। नए भवन में उनकी किताबों को डिजिटल स्वरूप में लाने की कोशिश होगी। इसी गांव में उनके नाम पर महाविद्यालय, इंटर काॅलेज और हिंदी माध्यम से विद्यापीठ शिक्षण संस्थान संचालित हो रहे हैं। उनके जमाने में हवेली के दोनों ओर मंदिर थे जो आज भी हैं। एक तरफ जैन मंदिर और दूसरी तरफ वैदेही सरकार का मंदिर। वैदेही सरकार मंदिर में वह स्वयं पूजा करने के लिए जाते थे।
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम वीडियो सिर्फ सब्सक्राइबर्स के लिए उपलब्ध है
प्रीमियम वीडियो
सभी विशेष आलेख
फ्री इ-पेपर
सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।