दक्षिण एशिया में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव अब वैश्विक भू-राजनीति का नया रूप ले चुका है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने खुलकर ऐलान किया है कि अब अफगानिस्तान के साथ “खुली जंग” शुरू हो चुकी है। उन्होंने सामाजिक माध्यम मंच ‘एक्स’ पर तालिबान को भारत का मोहरा बताते हुए चेतावनी दी कि पाकिस्तान का सब्र अब खत्म हो गया है।
पाकिस्तान ने 22 फरवरी को अफगानिस्तान के अंदर हवाई हमला किया था। इसके बाद तालिबान ने जवाबी कार्रवाई की, जिससे सीमा पर तनाव और बढ़ गया। इसके जवाब में पाकिस्तान ने राजधानी काबुल और दक्षिणी शहर कंधार पर फिर से हवाई हमले किए। पाकिस्तान का दावा है कि उसने कई ठिकानों को नष्ट किया है, जबकि तालिबान ने पाकिस्तानी चौकियों और सैन्य अड्डों को तबाह करने का दावा किया है।
इसी बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीबी रणनीतिक विचारक अलेक्जेंडर डुगिन ने बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि यह युद्ध केवल सीमा विवाद नहीं, बल्कि ब्रिक्स के खिलाफ एक बड़ी वैश्विक साजिश का हिस्सा है।
डुगिन ने आरोप लगाया कि डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका की रणनीति ब्रिक्स को कमजोर करने की है। उनके अनुसार इस संघर्ष के पीछे बड़ी शक्तियों का खेल है, जिसमें पाकिस्तान को चीन का समर्थन प्राप्त है और अफगानिस्तान को भारत का। उनका मानना है कि यदि दक्षिण एशिया युद्ध में उलझ जाता है, तो ब्रिक्स का आर्थिक और रणनीतिक एजेंडा कमजोर हो जाएगा और इससे अमेरिका को अपनी वैश्विक पकड़ मजबूत करने का अवसर मिलेगा।
अब सवाल उठता है कि आखिर ट्रंप और अमेरिका को ब्रिक्स से डर क्यों है।
दरअसल, ब्रिक्स दुनिया के उभरते हुए शक्तिशाली देशों का समूह है, जिसमें भारत, चीन, रूस, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। यह समूह वैश्विक शक्ति संतुलन को बदलने की क्षमता रखता है और अमेरिका की आर्थिक तथा राजनीतिक पकड़ को चुनौती देता है।
इसका पहला कारण है डॉलर की ताकत को चुनौती। वर्तमान में दुनिया का अधिकांश व्यापार डॉलर में होता है, जिससे अमेरिका को बड़ी आर्थिक शक्ति मिलती है। लेकिन ब्रिक्स देश अपनी-अपनी मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। यदि ऐसा होता है, तो डॉलर की मांग कम हो सकती है और अमेरिका की आर्थिक ताकत कमजोर पड़ सकती है।
दूसरा कारण है अमेरिका की महाशक्ति की स्थिति को खतरा। ब्रिक्स एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थन करता है, जिसमें केवल एक देश का प्रभुत्व न हो। इससे चीन और रूस जैसी शक्तियों का प्रभाव बढ़ सकता है और अमेरिका का वर्चस्व कम हो सकता है।
तीसरा कारण चीन को रोकने की रणनीति है। चीन पहले से ही आर्थिक और सामरिक रूप से तेजी से आगे बढ़ रहा है। ब्रिक्स चीन को अपना प्रभाव बढ़ाने का मंच देता है, जो अमेरिका के लिए चिंता का विषय है।
चौथा कारण है अमेरिकी प्रतिबंधों की ताकत का कमजोर होना। अमेरिका कई देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाकर दबाव बनाता है। लेकिन यदि ब्रिक्स देश आपस में डॉलर के बिना व्यापार करते हैं, तो इन प्रतिबंधों का असर कम हो सकता है।
पांचवां कारण यह है कि ब्रिक्स अपनी अलग वित्तीय और आर्थिक व्यवस्था विकसित कर रहा है, जैसे नया विकास बैंक और वैकल्पिक भुगतान तंत्र। इससे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं का प्रभाव कम हो सकता है, जिन पर अमेरिका का मजबूत प्रभाव रहा है।
संक्षेप में कहा जाए तो अमेरिका को डर है कि ब्रिक्स डॉलर की प्रधानता को चुनौती दे सकता है, अमेरिका की महाशक्ति की स्थिति को कमजोर कर सकता है, चीन और रूस की ताकत बढ़ा सकता है और वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल सकता है। यही कारण है कि पाकिस्तान-अफगानिस्तान संघर्ष को भी अब बड़ी वैश्विक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।