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US-Greenland Row: 6 NATO देशों के सैनिक पहुंचे ग्रीनलैंड?
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: आदर्श Updated Fri, 16 Jan 2026 03:43 PM IST
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ग्रीनलैंड को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। आर्कटिक क्षेत्र में स्थित यह बर्फीला द्वीप अचानक वैश्विक रणनीति का केंद्र बन गया है। डेनमार्क के स्वायत्त क्षेत्र ग्रीनलैंड की सुरक्षा को लेकर नाटो (NATO) देशों ने सक्रियता बढ़ा दी है। डेनमार्क की अपील पर अब तक छह नाटो देशों ने वहां अपने सैनिक या सैन्य कर्मी भेजने का फैसला किया है। स्वीडन, नॉर्वे, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड्स और कनाडा की इस पहल को ग्रीनलैंड के आसपास बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
असल में, ग्रीनलैंड की अहमियत सिर्फ उसकी भौगोलिक स्थिति तक सीमित नहीं है। आर्कटिक क्षेत्र में मौजूदगी, दुर्लभ खनिज संसाधन और उत्तरी समुद्री मार्गों पर नियंत्रण ये सभी वजहें इसे वैश्विक शक्तियों के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण बनाती हैं। यही कारण है कि हाल के वर्षों में रूस और चीन की बढ़ती दिलचस्पी के बीच पश्चिमी देशों की चिंता भी बढ़ी है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताते हुए उस पर कब्जे तक की बात कह दी। ट्रंप का दावा रहा है कि अगर अमेरिका ने समय रहते कदम नहीं उठाया, तो रूस और चीन ग्रीनलैंड का फायदा उठा सकते हैं। उनके इस बयान ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड प्रशासन को सतर्क कर दिया, जिसके बाद सहयोगी देशों से सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की अपील की गई।
सबसे पहले स्वीडन ने ग्रीनलैंड में सैनिक भेजने का ऐलान किया। स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने साफ कहा कि यह कदम डेनमार्क के अनुरोध पर उठाया गया है। यह तैनाती डेनमार्क के सैन्य अभ्यास ‘ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस’ के तहत की जा रही है, जिसका मकसद आर्कटिक क्षेत्र में संयुक्त सुरक्षा क्षमताओं को परखना है। इसके बाद नॉर्वे भी आगे आया। नॉर्वे के रक्षा मंत्री टोरे सैंडविक ने बताया कि उनका देश दो सैन्य कर्मियों को ग्रीनलैंड भेज रहा है। उन्होंने कहा कि नाटो देश लगातार इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा को कैसे मजबूत किया जाए।
यूरोप की बड़ी सैन्य शक्ति जर्मनी ने भी इसमें कदम बढ़ाया। जर्मन सरकार के मुताबिक, एक टोही मिशन के तहत 13 सैनिक ग्रीनलैंड भेजे जाएंगे। इस मिशन का उद्देश्य क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति का आकलन करना है, जिसमें समुद्री निगरानी जैसे पहलू भी शामिल हैं। जर्मनी का यह कदम दिखाता है कि आर्कटिक अब केवल उत्तरी देशों की चिंता नहीं, बल्कि पूरे नाटो के एजेंडे में शामिल हो चुका है।
फ्रांस ने भी ग्रीनलैंड में अपने सैन्य कर्मी भेजने की पुष्टि की है। फ्रांसीसी सैन्य अधिकारियों के अनुसार, ये सैनिक अन्य सहयोगी देशों के साथ संयुक्त अभ्यास में हिस्सा लेंगे। वहीं नीदरलैंड्स और कनाडा ने भी सीमित स्तर पर सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का फैसला किया है।
हालांकि, नाटो की इस तैनाती का मकसद पूरी तरह आक्रामक नहीं माना जा रहा है। एक तरफ नाटो देश यह संदेश देना चाहते हैं कि वे ट्रंप की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर रहे हैं। वे यह भी दिखाना चाहते हैं कि अगर रूस और चीन से किसी तरह का खतरा है, तो उसका जवाब नाटो के भीतर मिलकर दिया जाएगा। दूसरी तरफ, यूरोपीय और कनाडाई सैनिकों की मौजूदगी ट्रंप के लिए भी एक संकेत है कि ग्रीनलैंड पर कब्जे की कोई भी कोशिश नाटो के भीतर टकराव का कारण बन सकती है।
नाटो के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद भी साफ दिख रहे हैं। ट्रंप लगातार कहते रहे हैं कि ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा के लिए अहम है और नाटो को इस दिशा में अमेरिका की मदद करनी चाहिए। लेकिन डेनमार्क समेत नाटो के अन्य सदस्य देशों ने इस मांग को खारिज कर दिया है। उनका साफ कहना है कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और नाटो के नियमों के तहत कोई भी सदस्य देश दूसरे सदस्य पर हमला नहीं कर सकता।
फिलहाल, ग्रीनलैंड में सैनिकों की संख्या बेहद सीमित है, जिससे यह साफ है कि यह कदम सैन्य ताकत दिखाने से ज्यादा राजनीतिक संदेश देने और एकजुटता जताने के लिए उठाया गया है। लेकिन इतना तय है कि ग्रीनलैंड अब सिर्फ बर्फ से ढका द्वीप नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का अहम मोहरा बन चुका है।
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