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डाउन सिंड्रोम: ज्यादा उम्र में बने मम्मी-पापा...खुद भुगत रहे और बच्चा भी
संवाद न्यूज एजेंसी, गोरखपुर
Updated Thu, 14 May 2026 03:08 AM IST
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गोरखपुर। कॅरिअर, तरक्की और स्थायित्व आने तक युवा शादी और परिवार बढ़ाने के फैसले को टालते जा रहे हैं। ऐसे में उम्र अधिक होने पर दोनों में प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है। कई दंपती गर्भावस्था में जांच के दौरान डाउन सिंड्रोम ग्रसित बच्चे की पुष्टि होने के बावजूद भी अगली पीढ़ी की चाहत में उन्हें जन्म देते हैं और उसकी देखभाल कर रहे हैं। कई ऐसे भी हैं जो ऐसी समस्याओं के बारे में जानने के बाद शादी ही नहीं करते।
अस्पतालों में लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ती उम्र के साथ प्रजनन से जुड़ीं समस्याएं भी बढ़ रही हैं। एक उम्र के बाद संतान पैदा करने पर कई जटिलताएं आ जाती हैं। उनमें से एक डाउन सिंड्रोम है। यह एक आनुवंशिक विकार है, जो बच्चे में 21वें क्रोमोसोम की अतिरिक्त कॉपी के कारण होता है, जिससे उसका मानसिक और शारीरिक विकास प्रभावित होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की जलवायु में महिलाओं के लिए 35 वर्ष की उम्र के बाद गर्भधारण जटिलता रहने की आशंका ज्यादा रहती है। इस उम्र के बाद अंडाणुओं की गुणवत्ता प्रभावित होने लगती है। इसमें महिलाओं के साथ ही पुरुषों की उम्र भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पुरुषों की प्रजनन क्षमता भी 40 वर्ष के बाद घटने लगती है और इससे आनुवंशिक विकारों की आशंका बढ़ सकती है।
उम्र बढ़ने के साथ स्पर्म की क्वालिटी और मोटिलिटी (गति) घटने लगती है, जिससे गर्भधारण में कठिनाई आती है और भ्रूण में आनुवंशिक समस्याएं हो सकती हैं। कम और अधिक उम्र दोनों ही गर्भधारण के लिए मां और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है।
महिलाओं के लिए 25 से 30 और पुरुषों के लिए भी 30-35 वर्ष की उम्र तक पिता बनने की संभावना अधिक अनुकूल होती है। डॉक्टर बिना कारण के परिवार के निर्माण में देरी को सही नहीं बताते हैं। उनका कहना है कि उम्र के साथ ही किसी तरह की आनुवांशिक दिक्कत होने पर भी डाउन सिंड्रोम की समस्या हो सकती है। ऐसे में हर उम्र की महिलाओं को गर्भावस्था में जांच कराना जरूरी है। इसकी जांच महंगी होने के कारण कई दंपती कराने से कतराते हैं।
ऐसे बच्चों में मानसिक विकास धीमा होता है, बोलने में कठिनाई होती है, हृदय संबंधी रोगों की आशंका अधिक रहती है। उम्र अधिक होने पर हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और मोटापा गर्भावस्था के दौरान भी जटिलताएं पैदा करते हैं। देर से गर्भधारण करने पर हार्मोनल असंतुलन की समस्या भी बढ़ सकती है। हम सभी महिलाओं को स्क्रीनिंग कराने की सलाह देते हैं, जांच में पॉजिटीव आने पर बच्चे में होने वाली दिक्कतों के बारे में बताते हैं।
-डॉ. आराधना सिंह, स्त्री रोग विशेषज्ञ, एम्स
अस्पतालों में लगातार ऐसे मामले सामने आ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ती उम्र के साथ प्रजनन से जुड़ीं समस्याएं भी बढ़ रही हैं। एक उम्र के बाद संतान पैदा करने पर कई जटिलताएं आ जाती हैं। उनमें से एक डाउन सिंड्रोम है। यह एक आनुवंशिक विकार है, जो बच्चे में 21वें क्रोमोसोम की अतिरिक्त कॉपी के कारण होता है, जिससे उसका मानसिक और शारीरिक विकास प्रभावित होता है।
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विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की जलवायु में महिलाओं के लिए 35 वर्ष की उम्र के बाद गर्भधारण जटिलता रहने की आशंका ज्यादा रहती है। इस उम्र के बाद अंडाणुओं की गुणवत्ता प्रभावित होने लगती है। इसमें महिलाओं के साथ ही पुरुषों की उम्र भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पुरुषों की प्रजनन क्षमता भी 40 वर्ष के बाद घटने लगती है और इससे आनुवंशिक विकारों की आशंका बढ़ सकती है।
उम्र बढ़ने के साथ स्पर्म की क्वालिटी और मोटिलिटी (गति) घटने लगती है, जिससे गर्भधारण में कठिनाई आती है और भ्रूण में आनुवंशिक समस्याएं हो सकती हैं। कम और अधिक उम्र दोनों ही गर्भधारण के लिए मां और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है।
महिलाओं के लिए 25 से 30 और पुरुषों के लिए भी 30-35 वर्ष की उम्र तक पिता बनने की संभावना अधिक अनुकूल होती है। डॉक्टर बिना कारण के परिवार के निर्माण में देरी को सही नहीं बताते हैं। उनका कहना है कि उम्र के साथ ही किसी तरह की आनुवांशिक दिक्कत होने पर भी डाउन सिंड्रोम की समस्या हो सकती है। ऐसे में हर उम्र की महिलाओं को गर्भावस्था में जांच कराना जरूरी है। इसकी जांच महंगी होने के कारण कई दंपती कराने से कतराते हैं।
ऐसे बच्चों में मानसिक विकास धीमा होता है, बोलने में कठिनाई होती है, हृदय संबंधी रोगों की आशंका अधिक रहती है। उम्र अधिक होने पर हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और मोटापा गर्भावस्था के दौरान भी जटिलताएं पैदा करते हैं। देर से गर्भधारण करने पर हार्मोनल असंतुलन की समस्या भी बढ़ सकती है। हम सभी महिलाओं को स्क्रीनिंग कराने की सलाह देते हैं, जांच में पॉजिटीव आने पर बच्चे में होने वाली दिक्कतों के बारे में बताते हैं।
-डॉ. आराधना सिंह, स्त्री रोग विशेषज्ञ, एम्स