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UP: दवाएं भरपूर... फिर भी पशुपालक मेडिकल स्टोर से खरीदने को मजबूर, अस्पताल से दवाएं देने में होता है परहेज
Sun, 02 Aug 2026 01:57 PM IST
Ishwar Ashish Bhartiya
चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ
चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Ishwar Ashish Bhartiya
Updated Sun, 02 Aug 2026 01:57 PM IST
सार
यूपी के सरकारी पशु अस्पतालों में दवाएं होने के बावजूद पशुपालक बाहर दवाएं खरीदने को मजबूर है। अस्पताल से पशुपालकों को दवाएं देने में परहेज किया जाता है।
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सरकारी अस्पतालों में नहीं मिल रहीं दवाएं।
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
उत्तर प्रदेश के सरकारी पशु अस्पतालों में दवाओं की कोई कमी नहीं है। कई जगह तो दवाएं रखे रखे खराब भी हो रही हैं। इसके बावजूद पशुपालकों को निजी मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। सरकारी अस्पतालों से दवाएं न मिलने के कारण प्रतिदिन आने वाले पशुओं की संख्या बहुत कम है।
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अमर उजाला की पड़ताल में सामने आया कि अस्पतालों में कीड़ा मारने से लेकर एंटीबायोटिक्स तक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। भवन जर्जर होने के बावजूद टीके रखने के लिए रेफ्रिजरेटर भी मौजूद हैं। इंटौजा के फार्मासिस्ट अजय ने दवाओं की कमी न होने की पुष्टि की। यहां औसतन 10 से 15 पशु प्रतिदिन उपचार के लिए आते हैं। लखनऊ के मोहनलालगंज स्थित पशु अस्पताल के फार्मासिस्ट पंकज श्रीवास्तव ने भी दवाओं की कमी से इन्कार किया। उनके अस्पताल में प्रतिदिन पांच से सात पशु ही आते हैं।
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पशुपालकों की समस्या : नेवादा गांव की दुलारी ने बताया कि उन्हें सरकारी अस्पताल से दवाएं नहीं मिलतीं। पिछले वर्ष उनकी भैंस को बच्चा देते समय समस्या हुई थी। सरकारी डॉक्टर ने ढाई हजार रुपये की दवाएं लिख दी थीं। सीतापुर के देवीपुर गांव के पशुपालकों ने भी यही बात कही। उनका कहना है कि अस्पताल से दवा न मिलने पर निजी डॉक्टर बुलाना पड़ता है। रायबरेली के गुमावां सीमा के विजय सिंह का आरोप है कि जब रुपये देकर दवा खरीदनी है तो अस्पताल जाने का क्या फायदा।
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अस्पताल की व्यवस्था और निर्देश: पशु अस्पताल में पर्चा शुल्क निर्धारित है। मुर्गी का उपचार निशुल्क है, जबकि गाय-भैंस का पांच रुपये और बकरी का दो रुपये पर्चा शुल्क लगता है। कीड़ा मारने की दवा, बारिश में जहरीली घास से होने वाली समस्या में सोडियम सल्फेट, कॉपर, मिनरल और एंटीबायोटिक्स जैसी दवाएं निशुल्क दी जाती हैं।
दवाओं की उपलब्धता और ओपीडी
- सिधौली के एक जर्जर पशु अस्पताल में दवाओं के ढेर मिले। एक अलमारी में कीड़े मारने की दवाएं भरी थीं तो दूसरी में एंटीबायोटिक्स।
- रायबरेली के शिवगढ़ अस्पताल में भी दवाओं की कमी नहीं दिखी। इसके बावजूद कई अस्पतालों में प्रतिदिन पांच से सात पशु ही इलाज के लिए पहुंचते हैं।
- पशुपालकों का मानना है कि यदि दवाएं निशुल्क मिलें तो ओपीडी में वृद्धि होगी। अमेठी के सेमरीता में भी पशुपालकों को दवाएं न मिलने की शिकायत है।