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UP: हाईकोर्ट ने दहेज हत्या में उम्रकैद को 'दुर्लभतम' मामलों तक सीमित किया, सजा घटाकर आरोपी रिहा

डिजिटल डेस्क, लखनऊ Published by: Akash Dwivedi Updated Thu, 28 May 2026 06:13 PM IST
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सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने दहेज हत्या मामले में कहा कि उम्रकैद की सजा केवल दुर्लभतम मामलों में ही दी जानी चाहिए। अदालत ने 2012 के लखनऊ दहेज हत्या मामले में दोष सिद्धि बरकरार रखते हुए सास, ससुर और पति की सजा घटाकर जेल में बिताई अवधि के बराबर कर दी, जिसके बाद आरोपियों की रिहाई का रास्ता साफ हुआ।

UP Big News: Akhilesh Says—Youth Should Declare 'No More BJP' Today; Youth Murdered After Offering Namaz; Muni
प्रतीकात्मक फोटो - फोटो : संवाद
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विस्तार

हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने दहेज हत्या के मामले में अहम फैसला दिया है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में उम्रकैद की सजा सामान्य प्रक्रिया के तौर पर नहीं दी जानी चाहिए। ऐसी कठोर सजा सिर्फ दुर्लभतम मामलों में ही देनी चाहिए। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने यह टिप्पणी वर्ष 2012 में लखनऊ के माल थानाक्षेत्र के एक दहेज हत्या के मामले में की।



खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि हत्या की धारा 302 के लिए इस्तेमाल होने वाले वाक्यांश दुर्लभतम से दुर्लभ मामले की तुलना दहेज हत्या की धारा 304-बी के तहत अपराध के विचारण में उससे नहीं की जा सकती और न ही उसे वही अर्थ दिया जा सकता है। इस आधार पर अदालत ने पति, उसके माता-पिता की अपील पर उनकी दोष सिद्धि को बरकरार रखा। 
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खंडपीठ ने आनुपातिक सजा के सिद्धांत पर ट्रायल कोर्ट द्वारा दी सजाओं को कम कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने सास रामरती को उम्रकैद और पति व ससुर को 20 साल की सजा सुनाई थी। पीठ ने इस सजा को घटाकर उस अवधि के बराबर कर दिया जितनी अवधि वे पहले ही जेल में बिता चुके थे। 

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यह है मामला 

लखनऊ के अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता की शादी सुनील कुमार से हुई थी। उसके ससुराल वाले दहेज के लिए उसे परेशान करते थे। 13 मई 2012 को याची को खबर मिली कि उसकी बेटी को आग लग गई और ससुराल वाले उसे सिविल अस्पताल ले गए हैं। पर, जब वह अस्पताल पहुंचा तो पीड़िता के ससुराल वाले भाग गए। एसडीएम को दिए बयान में पीड़िता ने बताया था कि पति ने उसे पीटा था और अगली सुबह सास, ससुर और पति ने उस पर केरोसिन डालकर उसे आग लगा दी। पीड़िता की 4 जून 2012 को मौत हो गई थी।

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