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डॉक्टर की सलाह: इंसेफेलाइटिस के बाद चूहों से फैल रही लेप्टोस्पायरोसिस बीमारी, शोध में हुआ खुलासा

अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर। Published by: vivek shukla Updated Sat, 13 Aug 2022 01:33 PM IST
सार

बुखार के नए स्वरूप पर महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय ने आरएमआरसी के साथ मिलकर शोध किया है। इसे लेकर शुक्रवार को विभिन्न संस्थाओं के विशेषज्ञों के मध्य कांफ्रेंस के जरिये शोध परिणाम पर मंथन भी किया गया है।

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Leptospirosis disease spreading from rats after encephalitis
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

पूर्वांचल में इंसेफेलाइटिस के बाद लेप्टोस्पायरोसिस नाम की बीमारी लोगों को गंभीर रूप से बीमार कर रही है। यह चूहे से फैल रही है। महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय और रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर (आरएमआरसी) के शोध में यह खुलासा हुआ है। विशेषज्ञों ने बताया है कि समय रहते जानकारी मिलने से इंसेफेलाइटिस की तरह की इस पर भी काबू पाया जा सकता है।



बुखार के नए स्वरूप पर महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय ने आरएमआरसी के साथ मिलकर शोध किया है। इसे लेकर शुक्रवार को विभिन्न संस्थाओं के विशेषज्ञों के मध्य कांफ्रेंस के जरिये शोध परिणाम पर मंथन भी किया गया है।

शोध की जानकारी देते हुए महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय के कुलपति मेजर जनरल डॉ. अतुल वाजपेयी ने बताया कि विश्वविद्यालय से संबद्ध गुरु गोरखनाथ चिकित्सालय में इस वर्ष आरएमआरसी के सहयोग से बुखार का कारण जानने का प्रयास किया गया। बताया कि समय रहते जिस तरह इंसेफेलाइटिस पर सरकार ने काबू पाया है। उसी तरह इस पर भी काबू पाया जा सकता है।
 

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Leptospirosis disease spreading from rats after encephalitis
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

शोध में 50 फीसदी नमूनों में लेप्टोस्पायरोसिस की पुष्टि
अस्पताल में भर्ती मरीजों पर पांच तरह की बीमारियों स्क्रब टायफस, लेप्टोस्पायरोसिस, डेंगू, चिकनगुनिया और एंटारोटा वायरस पर जांच शुरू की गई। 20 जून से छह अगस्त के बीच 88 रक्त नमूनों की जांच की गई। इनमें से 50 फीसदी यानी 44 नमूनों में लेप्टोस्पायरोसिस पॉजिटिव मिला। जबकि, एक में स्क्रब टायफस, नौ में डेंगू आईजीएम, तीन में चिकनगुनिया और तीन में एंटारोटा वायरस के केस मिले हैं।

 

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Leptospirosis disease spreading from rats after encephalitis
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

चौथे और पांचवें दिन हल्के पीलिया, निमोनिया के लक्षण
मेजर जनरल डॉ. अतुल वाजपेयी ने बताया कि शोध में पाया गया है कि लेप्टोस्पायरोसिस बीमारी 20 से 60 वर्ष के उम्र के लोगों में हो रही है। इससे बिना ठंड के उच्च तापमान का बुखार हो रहा है। मरीज के पूरे शरीर में दर्द रहता है। चौथे-पांचवें दिन कुछ मरीजों में हल्के पीलिया और कुछ में निमोनिया के लक्षण मिलने लगते हैं। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि मोनोसेफ, मैरोपैनम व थर्ड-फोर्थ जनरेशन की एंटीबायोटिक दवाओं का उतना असर नहीं होता, जितना सामान्य निमोनिया के मामलों में दिखता है।
 

Leptospirosis disease spreading from rats after encephalitis
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

चूहों के मूत्र से हो रही लेप्टोस्पायरोसिस बीमारी
डॉ. वाजपेयी ने बताया कि लेप्टोस्पायरोसिस अधिकतर चूहों के शरीर में रहता है और उसके मूत्र से यह वातावरण में आता है। त्वचा के जरिये यह मनुष्य के शरीर में पहुंचकर उन्हें बीमार करता है। लेप्टोस्पायरोसिस के इलाज में टेट्रासाइक्लिन, क्लोरोमाइसेटिन, डॉकसीसाईक्लिन आदि एंटीबायोटिक दवाएं कारगर हैं, लेकिन मौजूदा समय में डॉक्टर इसका उपयोग कम कर रहे हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

इन विशेषज्ञों ने किया शोध पर मंथन
महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय के कुलपति मेजर जनरल डॉ. अतुल वाजपेयी ने बताया कि शोध को एम्स की कार्यकारी निदेशक डॉ. सुरेखा किशोर, डॉ. तेजस्वी, केजीएमयू लखनऊ के कुलपति जनरल विपिन पुरी, मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष डॉ. हिमांशु, गोरखपुर के सीएमओ डॉ. आशुतोष कुमार दूबे, बीआरडी मेडिकल कॉलेज से डॉ. राजकिशोर, आरएमआरसी से डॉ. राजीव सिंह, डॉ. एसपी बेहरा आदि विशेषज्ञों ने माना कि लेप्टोस्पायरोसिस पर शोध प्राथमिक तौर पर बिल्कुल ठीक है। यह बीमारी महाराष्ट्र और गुजरात में पहले से है।
 

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