रात का स्याह अंधेरा और इस अंधेरे को चीरती तेज रोशनी के बीच हजरतगंज के पॉश इलाके में गांधी प्रतिमा के चबूतरे और सीढ़ियों पर सोते तमाम लोग...। बालू अड्डा हो, मुंशीपुलिया हो, पॉलीटेक्निक चौराहा हो, फुटओवर ब्रिज हों या फिर मेट्रो स्टेशन के फुटपाथ...रात ढलते ही इन जगहों की तस्वीर बदल जाती है। हाल के दिनों में इन खानाबदोशों की संख्या भी कई गुना हो गई है। आखिर कौन हैं ये लोग? कहां से आए हैं? सवाल बहुतेरे हैं पर जवाब एक ही, ये मेहनतकश हैं जो शहर को बनाते हैं। संवारते हैं। ये मजदूर हैं। ऐसे मजदूर जो कोरोना काल में रोजगार छिनने पर शहर से गांव लौटने को मजबूर हुए और तमाम दावों के बावजूद गांवों में काम न मिलने पर शहर आने को मजबूर हो गए। पर शहर में इनके पास घर नहीं है, है तो बस फुटपाथ। यहीं गृहस्थी सजती है...बिछौना बिछता है और सुबह काम पर जाते हैं तो गृहस्थी पेड़ों पर टंग जाती है।
रिपोर्ट: पेड़ों पर गृहस्थी... फुटपाथ पर बिछौना, रोजगार छिनने के बाद खानाबदोशों की तरह जीवन गुजार रहे मजदूर
गंज की खूबसूरत और जगमग रात के बीच गांधी प्रतिमा के पास से हम गुजरे। यहां सीढ़ियों पर लोग सोते मिले। बेचैन करते सवालों का जवाब तलाशने के लिए अमर उजाला संवाददाता ने जाग रहे बबलू को टटोला। बबलू बताता है कि वह राजधानी से सटे बाराबंकी जिले से रोजी-रोटी की तलाश में राजधानी आया है। बोला-क्या करूं साहब मुंबई में काम करता था। पर, कोरोना काल ने सब छीन लिया। वापस नहीं आता तो क्या करता? मेरे एक पैर में समस्या है। पर, अपने मां-बाप का सहारा हूं। उन्हें दवा, खाने-पीने की कोई दिक्कत न हो, इसलिए काम की तलाश में लखनऊ आ गया। होटलों में काम करके 250 रुपये तक कमा लेता हूं। यहां न सोऊं तो कुछ बचा ही नहीं सकता। सबकुछ छूट गया...मैं मो. मंसूर से बबलू बन गया। मैं चौंका? आखिर नाम क्यों बदला? वह बोल पड़ा-साहब इस नाम को सुनकर लोग काम नहीं देते।
बालू अड्डे पर बहराइच के शिवचरण लोधी मिले। वह दिल्ली में होटल में काम करते थे। बताते हैं, दूसरी लहर में कोरोना के मामले बढ़े तो दिल्ली छोड़कर गांव आ गया। प्रधान ने हौसला दिया कि यहीं काम मिल जाएगा। पर, मिला कुछ नहीं। आखिर पेट तो पालना ही है, इसलिए लखनऊ का रुख कर लिया। यहां करीब 400 रुपये तक रोजाना कमा लेता हूं। बालू अड्डे पर तो सोने वालों के साथ हादसा भी हो चुका है, फिर भी...? शिवचरण बोले, वो तो है, पर जब अंटी में पैसा नहीं हो तो खतरा तो उठाना ही पड़ेगा। कुछ ऐसी ही कहानियां हैं यहां सीतापुर, लखीमपुर, बाराबंकी जैसे जिलों से आए प्रकाश, राजू, पहलवान, दीपू व उनके जैसे अन्य श्रमिकों की।
पॉलीटेक्निक चौराहा : पहले तो 20-30 ही सोते थे, लॉकडाउन खत्म होने के बाद 80-100 हो गए
शहर के व्यस्ततम चौराहों में से एक है पॉलीटेक्निक। बसों और अन्य वाहनों की रेलमपेल के बीच भी यहां के पांच डिवाइडरों पर लोग सोते मिल जाएंगे। यहां चाय की दुकान लगाने वाले वारिस बताते हैं कि पहले यहां इतने मजदूर नहीं सोते थे। लॉकडाउन खुलने के बाद इनकी संख्या तेजी से बढ़ गई। कितनी...? वारिस बताते हैं, पहले यही कोई 20-30 लोग होते थे, पर अब तो 80-100 के बीच रहते हैं। दिनभर यह लोग काम की तलाश में चले जाते हैं। काम से लौटते वक्त पेट भरने तक का ही राशन लाते हैं। रात में फु टपाथ पर ईंटों के चूल्हे पर इनकी रसोई सज जाती है। ...और चूल्हे सिमटने के बाद बिछौने।
मुंबई में अच्छा कमा लेता था...यहां तो मनरेगा में काम के नाम पर पैसे मांगे जाते हैं
बहराइच से काम की तलाश में लखनऊ आए निरंकार अब पॉलीटेक्निक चौराहे के डिवाइडर पर सोकर रात गुजारते हैं। निरंकार बताते हैं, मैं मुंबई में कॉन्स्ट्रक्शन लाइन में अच्छा पैसा कमा लेता था। लॉकडाउन में घर आ गए। कुछ दिन जमापूंजी से घर चला। इसके बाद मनरेगा में काम तलाशना चाहा। पर, वहां पैसे मांगे गए। इसके बाद यहां आ गए। फैजाबाद रोड पर एक कॉन्स्ट्रक्शन साइट पर काम करता हूं। हफ्ते में एक बार हिसाब होता है। जो कमाते हूं, उसे बचा सकूं, इसलिए डिवाइडर पर सोता हूं।