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UP: आलू किसानों का दर्द...जो किसी ने नहीं समझा, अनुसंधान केंद्र और फूड प्रोसेसिंग यूनिट; 6 साल से देख रहे सपना
Sat, 01 Mar 2025 12:09 PM IST
धीरेन्द्र सिंह
अबरार अहमद, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अबरार अहमद, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Sat, 01 Mar 2025 12:09 PM IST
सार
आगरा के आलू किसान लंबे समय से आलू अनुसंधान केंद्र और आलू आधारित फूड प्रोसेसिंग यूनिट का सपना देख रहे हैं। उनका ये सपना कागजों में ही सिमट कर रह गया है।
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आलू किसान
- फोटो : अमर उजाला
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आगरा की टेढ़ी बगिया पार करते ही सड़क के दोनों ओर कतार में खड़े शीतगृह (कोल्ड स्टोरेज) और उनके सामने आलू की बोरियों से लदी ट्रॉलियां बरबस आपका ध्यान खींच लेती हैं। खेतों से आलू अब शीतगृह पहुंचने लगा है। पैदावार अच्छी हुई है लेकिन किसानों के चेहरे से खुशी गायब है, वजह दाम वैसे नहीं मिल रहे जैसी उम्मीद थी। किसानों का यह दर्द कमोबेश हर सीजन का है। उनका कहना है, सरकार हमारी कोई सुध नहीं ले रही। आलू अनुसंधान केंद्र और आलू आधारित फूड प्रोसेसिंग यूनिट सिर्फ सरकारी कागजों में सज रहे हैं। जमीन पर किसान आलू के साथ अपनी किस्मत पर रो रहा है, लागत तक नहीं निकल रही।
आलू किसान
- फोटो : अमर उजाला
किसानों से आलू खरीदने वाले व्यापारी भूरा सेठ कहते हैं, किसान से आलू लेकर मंडी तक पहुंचाने में कई खर्चे हैं। यहां का ज्यादातर आलू दक्षिण भारत और गुजरात जाता है। भुगतान भी देर से होता है। कई बार तो पैसे डूबने का भी खतरा रहता है इसलिए जोखिम भी है। सरकारी खरीद भी नहीं होती, जिससे किसान को ठीक दाम नहीं मिलता।
2019 में ही मिल गई थी अनुसंधान केंद्र को हरी झंडी
दिल्ली हाईवे पर गांव सींगना में अंतरराष्ट्रीय आलू अनुसंधान केंद्र बनाने की हरी झंडी 2019 में ही मिल गई थी। इसके लिए वर्ष 2020 में उद्यान विभाग ने करीब दस हेक्टेयर जमीन कृषि मंत्रालय को हस्तांतरित भी कर दी थी। यहां पेरू की मदद से 120 करोड़ रुपये की लागत से अनुसंधान केंद्र बनना था ताकि वैज्ञानिक आलू की नई प्रजातियों के साथ प्रोसेसिंग लायक आलू के बीज तैयार कर सकें। बीते छह साल में यहां धरातल पर कुछ काम नहीं हुआ है। एक साल पहले दस हेक्टेयर जमीन की अनुसंधान केंद्र के नाम रजिस्ट्री भर हुई है।
2019 में ही मिल गई थी अनुसंधान केंद्र को हरी झंडी
दिल्ली हाईवे पर गांव सींगना में अंतरराष्ट्रीय आलू अनुसंधान केंद्र बनाने की हरी झंडी 2019 में ही मिल गई थी। इसके लिए वर्ष 2020 में उद्यान विभाग ने करीब दस हेक्टेयर जमीन कृषि मंत्रालय को हस्तांतरित भी कर दी थी। यहां पेरू की मदद से 120 करोड़ रुपये की लागत से अनुसंधान केंद्र बनना था ताकि वैज्ञानिक आलू की नई प्रजातियों के साथ प्रोसेसिंग लायक आलू के बीज तैयार कर सकें। बीते छह साल में यहां धरातल पर कुछ काम नहीं हुआ है। एक साल पहले दस हेक्टेयर जमीन की अनुसंधान केंद्र के नाम रजिस्ट्री भर हुई है।
आलू
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
आगरा में 71 हजार हेक्टेयर में होती है आलू की खेती
प्रदेश में करीब 7 लाख हेक्टेयर भूमि पर आलू की बुवाई होती है। इसमें आगरा का रकबा करीब 71 हजार हेक्टेयर से ज्यादा का है। यहां खंदौली, शमसाबाद, एत्मादपुर, फतेहाबाद, किरावली क्षेत्र में आलू की बुवाई होती है। यूपी का 27 प्रतिशत आलू आगरा में ही पैदा होता है क्योंकि यहां की जलवायु और मिट्टी आलू उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त है। आगरा में सालाना करीब 50 लाख मीट्रिक टन आलू का उत्पादन होता है। इसके लिए हर साल 7 लाख मीट्रिक टन बीज की जरूरत पड़ती है।
आगरा में उगाई जाने वाली आलू की किस्में
आगरा में सबसे ज्यादा कुफरी बहार किस्म की खेती होती है। इसके बाद कुफरी मोहन, कुफरी चिप्सोना 1, 2, 3, 4, 5, कुफरी सदाबहार , कुफरी सूर्या, कुफरी आनंद, कुफरी पुखराज, कुफरी बादशाह, कुफरी ख्याति, कुफरी गरिमा आदि किस्में भी उगाई जाती हैं।
प्रदेश में करीब 7 लाख हेक्टेयर भूमि पर आलू की बुवाई होती है। इसमें आगरा का रकबा करीब 71 हजार हेक्टेयर से ज्यादा का है। यहां खंदौली, शमसाबाद, एत्मादपुर, फतेहाबाद, किरावली क्षेत्र में आलू की बुवाई होती है। यूपी का 27 प्रतिशत आलू आगरा में ही पैदा होता है क्योंकि यहां की जलवायु और मिट्टी आलू उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त है। आगरा में सालाना करीब 50 लाख मीट्रिक टन आलू का उत्पादन होता है। इसके लिए हर साल 7 लाख मीट्रिक टन बीज की जरूरत पड़ती है।
आगरा में उगाई जाने वाली आलू की किस्में
आगरा में सबसे ज्यादा कुफरी बहार किस्म की खेती होती है। इसके बाद कुफरी मोहन, कुफरी चिप्सोना 1, 2, 3, 4, 5, कुफरी सदाबहार , कुफरी सूर्या, कुफरी आनंद, कुफरी पुखराज, कुफरी बादशाह, कुफरी ख्याति, कुफरी गरिमा आदि किस्में भी उगाई जाती हैं।
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आलू
- फोटो : अमर उजाला
17वीं शताब्दी में भारत आया था आलू
आलू मूलरूप से भारतीय सब्जी नहीं है। इसकी उत्पत्ति दक्षिण अमेरिका के एंडीज पर्वत शृंखला में हुई थी। पेरू और बोलिविया में इसे हजारों वर्षों से लोग उगाकर खा रहे थे। 16वीं शताब्दी में आलू अमेरिका से यूरोप के देशों में पहुंचा और धीरे-धीरे लोकप्रिय हुआ। माना जाता है कि 17वीं शताब्दी के आसपास डच और अंग्रेज व्यापारी आलू को भारत ले आए। पहले यह समृद्ध परिवारों का हिस्सा रहा। 19वीं शताब्दी में आलू को यहां लोकप्रियता मिली और इसकी खेती उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में होने लगी।
आलू बोर्ड बने तभी होगा किसानों का भला
आलू उत्पादक किसान समिति के महासचिव आमिर का कहना है कि सरकार किसानों का सच में भला करना चाहती है तो आलू बोर्ड बनाए। उद्यान विभाग से इसे बाहर कर कृषि के दायरे में लाया जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 के चुनाव में आगरा के किसानों से फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने का वादा किया था, जो अब तक पूरा नहीं हुआ। अनुसंधान केंद्र भी केवल कागजों में दौड़ रहा है। सही नीति न होने से हमारे देश में खराब आलू शीतगृहों के बाहर सड़ता रहता है जबकि चीन में उससे शराब और सेंट बनाया जाता है। केंद्र व प्रदेश सरकार को इस पर सोचना होगा।
आलू मूलरूप से भारतीय सब्जी नहीं है। इसकी उत्पत्ति दक्षिण अमेरिका के एंडीज पर्वत शृंखला में हुई थी। पेरू और बोलिविया में इसे हजारों वर्षों से लोग उगाकर खा रहे थे। 16वीं शताब्दी में आलू अमेरिका से यूरोप के देशों में पहुंचा और धीरे-धीरे लोकप्रिय हुआ। माना जाता है कि 17वीं शताब्दी के आसपास डच और अंग्रेज व्यापारी आलू को भारत ले आए। पहले यह समृद्ध परिवारों का हिस्सा रहा। 19वीं शताब्दी में आलू को यहां लोकप्रियता मिली और इसकी खेती उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में होने लगी।
आलू बोर्ड बने तभी होगा किसानों का भला
आलू उत्पादक किसान समिति के महासचिव आमिर का कहना है कि सरकार किसानों का सच में भला करना चाहती है तो आलू बोर्ड बनाए। उद्यान विभाग से इसे बाहर कर कृषि के दायरे में लाया जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 के चुनाव में आगरा के किसानों से फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने का वादा किया था, जो अब तक पूरा नहीं हुआ। अनुसंधान केंद्र भी केवल कागजों में दौड़ रहा है। सही नीति न होने से हमारे देश में खराब आलू शीतगृहों के बाहर सड़ता रहता है जबकि चीन में उससे शराब और सेंट बनाया जाता है। केंद्र व प्रदेश सरकार को इस पर सोचना होगा।
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आलू से लदे ट्रैक्टर-ट्रॉली
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
केंद्र सरकार का है प्रोजेक्ट
उद्यान विभाग के उपनिदेशक धर्मपाल यादव ने बताया कि गांव सींगना में आलू अनुसंधान केंद्र के लिए जमीन स्थानांतरित हो गई है। यह केंद्र सरकार का प्रोजेक्ट है। विभाग के पास अभी इसमें कुछ नया अपडेट नहीं है।
अनुसंधान केंद्र के लिए प्रयासरत हूं
सांसद राजकुमार चाहर ने बताया कि सींगना में आलू अनुसंधान केंद्र के लिए मैं लगातार प्रयासरत हूं। बीते सप्ताह ही केंद्रीय कृषि सचिव देवेश चतुर्वेदी से मिला हूं। कृषि, पशुपालन व खाद्य प्रसंस्करण समिति में भी इस मुद्दे को उठाया है। उम्मीद है जल्द काम शुरू हो जाएगा।
उद्यान विभाग के उपनिदेशक धर्मपाल यादव ने बताया कि गांव सींगना में आलू अनुसंधान केंद्र के लिए जमीन स्थानांतरित हो गई है। यह केंद्र सरकार का प्रोजेक्ट है। विभाग के पास अभी इसमें कुछ नया अपडेट नहीं है।
अनुसंधान केंद्र के लिए प्रयासरत हूं
सांसद राजकुमार चाहर ने बताया कि सींगना में आलू अनुसंधान केंद्र के लिए मैं लगातार प्रयासरत हूं। बीते सप्ताह ही केंद्रीय कृषि सचिव देवेश चतुर्वेदी से मिला हूं। कृषि, पशुपालन व खाद्य प्रसंस्करण समिति में भी इस मुद्दे को उठाया है। उम्मीद है जल्द काम शुरू हो जाएगा।