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हालात : कार से चलती हैं यूपी की प्रधान तो एमपी की प्रधान ढो रही लकड़ियां, जानें क्यों है इतना अंतर
Sun, 11 Apr 2021 09:16 AM IST
शिखा पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Sun, 11 Apr 2021 09:16 AM IST
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यूपी की प्रधान व एमपी की प्रधान
- फोटो : अमर उजाला
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यह ऐसी हकीकत है जिसे बिना देखे विश्वास ही न हो। आपको दिखाते हैं उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की सीमा पर बसे लोगों के हालात में जमीन-आसामान का फर्क। मिसाल के तौर पर लेते हैं इधर, उधर के एक-एक गांव। दोनों की तस्वीर बिल्कुल जुदा है। इनमें फासला सिर्फ डेढ़ किलोमीटर का, लेकिन हालात का फर्क सैकड़ों किलोमीटर का।
बरात घर
- फोटो : अमर उजाला
पानी को तरस रहे, आंसू बरस रहे
यूपी बॉर्डर पार कर डेढ़ किलोमीटर चलने पर नजर आता है रजौला गांव। ग्राम प्रधान (पार्षद) गोल्ली देवी के घर के सामने बोरिंग (ट्यूबवेल) पर पानी के लिए लाइन लगी है। इसी बीच सिर पर लकड़ी का गट्ठर लादे एक बुजुर्ग महिला नजर आती हैं, गांव वाले बताते हैं यही हैं गोल्ली देवी पार्षद। हमें हैरत होती है, क्योंकि किसी प्रधान को इस दशा में हमने पहले कभी नहीं देखा। लोग इकट्ठा हुए और आंसुओं से सराबोर गांव की कथा सुनाई। गांव वालों ने बताया कि पूरे गांव में एक बोरिंग और दो हैंडपंप हैं।
चार हजार की आबादी के लिए पानी का मात्र ये ही सहारा। कभी-कभी तो यूपी के सरहदी गांव से पानी लाना पड़ता है। गांव के ज्यादातर लोग मजदूरी करते हैं। गांव के कुछ लोगों ने मिलकर एक टैंपो खरीदा और उससे कुछ कमाई हो जाती है जो आपस में बांट लेते हैं। संपर्क मार्ग तो है, लेकिन गांव के भीतर अभी भी कच्चे-पथरीले रास्ते हैं। पीने को ही पर्याप्त पानी है नहीं, सिंचाई कैसे हो?
यूपी बॉर्डर पार कर डेढ़ किलोमीटर चलने पर नजर आता है रजौला गांव। ग्राम प्रधान (पार्षद) गोल्ली देवी के घर के सामने बोरिंग (ट्यूबवेल) पर पानी के लिए लाइन लगी है। इसी बीच सिर पर लकड़ी का गट्ठर लादे एक बुजुर्ग महिला नजर आती हैं, गांव वाले बताते हैं यही हैं गोल्ली देवी पार्षद। हमें हैरत होती है, क्योंकि किसी प्रधान को इस दशा में हमने पहले कभी नहीं देखा। लोग इकट्ठा हुए और आंसुओं से सराबोर गांव की कथा सुनाई। गांव वालों ने बताया कि पूरे गांव में एक बोरिंग और दो हैंडपंप हैं।
चार हजार की आबादी के लिए पानी का मात्र ये ही सहारा। कभी-कभी तो यूपी के सरहदी गांव से पानी लाना पड़ता है। गांव के ज्यादातर लोग मजदूरी करते हैं। गांव के कुछ लोगों ने मिलकर एक टैंपो खरीदा और उससे कुछ कमाई हो जाती है जो आपस में बांट लेते हैं। संपर्क मार्ग तो है, लेकिन गांव के भीतर अभी भी कच्चे-पथरीले रास्ते हैं। पीने को ही पर्याप्त पानी है नहीं, सिंचाई कैसे हो?
बुंदेलखंड में पानी के लाले
- फोटो : अमर उजाला
बिजली की आवाजाही का समय तय नहीं। इतना पैसा है नहीं कि बच्चों को ऊंची पढ़ाई के लिए दूर भेज सकें। लड़कियों की कम उम्र में ही शादी कर देते हैं। सूई, सब्जी, अनाज... जरूरत का हर सामान खरीदने के लिए सीमा पार जाते हैं क्योंकि मध्य प्रदेश का बाजार सतना रजौला गांव से 75 किलोमीटर दूर है। गांव वाले बताते हैं कि उत्तर प्रदेश वाले कभी-कभी ताने मारते हैं कि आ गए एमपी वाले। लाकडाउन के दौरान चित्रकूट के संतों ने इस गांव का पेट भरा, वरना भूखों मर जाते। ज्यादातर घर कच्चे छप्पर के हैं।
राजधानी भोपाल तक गए फरियाद करने, मंत्री, सांसद और विधायक सबसे मिले, पर सबने टरका दिया। किसी तरह पैसा जुटाकर बोरिंग करवा दी है, ताकि पानी मिल सके। इलाकाई विधायक कांग्रेस से हैं तो कहते हैं कि क्या करें, उनकी सरकार नहीं है पति मंगल भी मजदूरी करते हैं। - गोल्ली देवी, पार्षद
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बुंदेलखंड की तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
पक्के मकान और हर घर में नल
चित्रकूट में रजौला गांव से ठीक उलट तस्वीर है यूपी के सेमरिया जगन्नाथ वासी गांव की। मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर बार्डर का यह अंतिम गांव है। प्रधान हैं दिव्या त्रिपाठी। एक घर गांव में और एक शहर में। कार से चलती हैं और ठाठबाट भी हैं। हां, गांव में काम भी खूब किया है और लगातार योजनाओं पर नजर भी रखती हैं। हर घर में नल है और बुनियादी सुविधाएं भी।
सेमरिया गांव में पक्की सड़कें, अच्छे घर, बरातशाला, सामुदायिक शौचालय, पंचायत भवन और पानी की बड़ी टंकी। ज्यादातर घरों में पानी का कनेक्शन। 568 फुट पर बोरिंग से पानी निकलता है। बड़े पैमाने पर खाद के गड्ढे भी बनवाए हैं ताकि इसका लाभ खेती में मिले। साक्षरता अभियान के तहत अनपढ़ महिलाओं को हस्ताक्षर करना सिखाया गया।
चित्रकूट में रजौला गांव से ठीक उलट तस्वीर है यूपी के सेमरिया जगन्नाथ वासी गांव की। मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर बार्डर का यह अंतिम गांव है। प्रधान हैं दिव्या त्रिपाठी। एक घर गांव में और एक शहर में। कार से चलती हैं और ठाठबाट भी हैं। हां, गांव में काम भी खूब किया है और लगातार योजनाओं पर नजर भी रखती हैं। हर घर में नल है और बुनियादी सुविधाएं भी।
सेमरिया गांव में पक्की सड़कें, अच्छे घर, बरातशाला, सामुदायिक शौचालय, पंचायत भवन और पानी की बड़ी टंकी। ज्यादातर घरों में पानी का कनेक्शन। 568 फुट पर बोरिंग से पानी निकलता है। बड़े पैमाने पर खाद के गड्ढे भी बनवाए हैं ताकि इसका लाभ खेती में मिले। साक्षरता अभियान के तहत अनपढ़ महिलाओं को हस्ताक्षर करना सिखाया गया।
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बुंदेलखंड की तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
अब वे अंगूठा नहीं लगातीं। गांव में नशामुक्ति अभियान भी चला। 135 महिलाओं को दिव्यांगता और विधवा पेंशन का लाभ मिल रहा है। मजदूरों को बेटियों की शादी के लिए आर्थिक मदद मिल रही है। छह हजार आबादी में 2242 वोटर हैं। समस्याएं भी हैं गांव के अनिल पटेल और नरेंद्र शुक्ला ने बताया कि नलों से अक्सर दूषित पानी आता है। गोशाला है, लेकिन वहां चारा-पानी का पुख्ता इंतजाम नहीं है। छुट्टा जानवर फसल नष्ट कर देते हैं।
रहते यूपी में, जमीन एमपी में: सेमरिया और आसपास गांव के कई लोग रहते यूपी में हैं लेकिन उनकी जमीन एमपी में हैं। बारिश, बाढ़, आग या अन्य कारणों से फसल नष्ट हो जाए तो मुआवजा नहीं मिलता क्योंकि निवास यूपी में है तो हक नहीं है।
हाईस्कूल के बाद पढ़ाई का इंतजाम नहीं है। लड़कियों के इंटर कालेज को भी मंजूरी मिल गई है। होम्योपैथिक अस्पताल के लिए जमीन आवंटित हो गई है। एटीएम भी लगवाने की कोशिश है। अच्छे काम के लिए दो बार सीएम से सम्मान और रानी लक्ष्मीबाई अवार्ड भी मिल चुका है। - दिव्या त्रिपाठी, निवर्तमान प्रधान
रहते यूपी में, जमीन एमपी में: सेमरिया और आसपास गांव के कई लोग रहते यूपी में हैं लेकिन उनकी जमीन एमपी में हैं। बारिश, बाढ़, आग या अन्य कारणों से फसल नष्ट हो जाए तो मुआवजा नहीं मिलता क्योंकि निवास यूपी में है तो हक नहीं है।