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श्रमिक दिवस विशेष: एमएसएमई का हब बना कानपुर, दो लाख श्रमिकों को दे रहा है रोजगार

अमित अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Sun, 01 May 2022 12:02 PM IST
सार

एक-एक कर मिलों के बंद होने के बाद एमएसएमई रोजगार का प्रमुख जरिया बनकर उभरा है। शहर की 32703 इकाइयों में 2,03,687 श्रमिक काम कर रहे हैं। वहीं, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए 24 अगस्त 2021 से ई-श्रम पंजीयन शुरू किया गया। मौजूदा समय में इसमें 15 लाख 15 हजार 776 श्रमिक पंजीकृत हैं।

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International Labor Day 2022, Kanpur becomes hub of MSMEs, two lakh workers are getting employment
फैक्ट्री में काम करते हुए श्रमिक - फोटो : अमर उजाला

एक समय देश की शान रहीं कानपुर की मिलों के बंद होने के बाद शहर एक बार फिर से वैश्विक पटल पर अपनी छाप बना रहा है। कानपुर अब सूक्ष्म, लघु और मध्यम इकाइयों का न केवल हब बनकर उभरा है, बल्कि अब तक के इतिहास में सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार देने का जरिया भी बना है। वर्तमान में 32703 इकाइयों में 2,03687 श्रमिक-कर्मचारी काम कर रहे हैं।



वहीं, जल्द ही रमईपुर मेगा लेदर क्लस्टर की नींव पड़ने के बाद एक लाख से ज्यादा लोगों को और प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार मिल सकेगा। दादानगर में फ्लैटेड इंडस्ट्री शुरू होने से भी हजारों लोगों को काम मिलेगा। स्वदेशी, एल्गिन, लालइमली जैसी मिलों के बंद होने के बाद सरकार की ओर एमएसएमई इकाइयों को लगातार प्रोत्साहित किया गया। शहर अब एमएसएमई का बड़ा केंद्र है। दादानगर, पनकी, फजलगंज, रूमा, चौबेपुर बड़े औद्योगिक हब बन चुके हैं।

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फैक्ट्री में काम करते हुए श्रमिक - फोटो : अमर उजाला

जिला उद्योग प्रोत्साहन तथा उद्यमिता विकास केंद्र के उपायुक्त उद्योग सुधीर श्रीवास्तव ने बताया कि उद्योग आधार और उद्यम पंजीकरण के आधार पर शहर में 32703 इकाइयां संचालित हैं। सितंबर 2020 से मार्च 2022 तक लेदर गुड्स की 860, होजरी उत्पाद की 217, प्लास्टिक उत्पादों की 621, इंजीनियरिंग गुड्स की 127, एग्रो फूडस की 727 और रेडीमेड गारमेंट की 780 इकाइयां पंजीकृत हुई हैं। ये लोगों के रोजगार का अहम जरिया बनकर सामने आई हैं। 

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International Labor Day 2022, Kanpur becomes hub of MSMEs, two lakh workers are getting employment
राजीव कुमार जालान और सुनील वैश्य - फोटो : अमर उजाला

शहर मौजूदा समय में एमएसएमई का गढ़ बन चुका है। सबसे ज्यादा रोजगार यही इकाइयां दे रही हैं। मिलों की बंदी के बाद इनके सृजन से फिर से शहर आगे बढ़ रहा है। रमईपुर मेगा लेदर क्लस्टर के बनने से एक लाख से ज्यादा लोगों को और रोजगार मिल सकेगा। - राजीव कुमार जालान, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, चर्म निर्यात परिषद

 

एक समय में मिल रोजगार के बड़े स्थान थे। सबसे ज्यादा रोजगार देतीं थीं। अब ये बंद हो चुकी हैं। एमएसएमई अब रोजगार का सबसे बड़ा प्लेटफार्म शहर में बन चुका है। इसके मिलकर और आगे बढ़ाया जाएगा। - सुनील वैश्य, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, आईआईए

International Labor Day 2022, Kanpur becomes hub of MSMEs, two lakh workers are getting employment
राजेश कुमार शुक्ला और असित कुमार सिंह - फोटो : अमर उजाला

आज कामगारों-मजदूरों की स्थिति 1889 के पूर्व की हो गई है। संगठित क्षेत्र में आठ घंटे के दाम पर 12 घंटे का काम लिया जा रहा हैं। वही असंगठित क्षेत्र में चार घंटे के दाम पर 12 से 14 घंटे काम लिया जा रहा हैं। अब फिर से सभी को संगठित होकर शिकागो जैसे संघर्ष करने की आवश्यकता है।
- राजेश कुमार शुक्ला, महामंत्री, ईपीएफ पेंशनर्स एसोसिएशन, उत्तर प्रदेश, कानपुर

 

30 साल पहले तक कानपुर किसी भी व्यक्ति को भूखे पेट सोने नहीं देता था। मिलों के चलने से तमाम खाने-पीने की दुकानें रात-दिन खुलती थीं। मिलों के कामगार जब निकलते थे तो शहर में कुछ समय तक सड़क पर केवल श्रमिक ही श्रमिक दिखाई देता था। अब सरकार की नीतियों के चलते मिलें बंद हो चुकी हैं। - असित कुमार सिंह, सचिव, एटक कानपुर

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कानुपर में एक पुरानी इंडस्ट्री - फोटो : अमर उजाला

एक पाली में ही एक हजार से ज्यादा लोग करते थे काम
1803 में 24 मार्च को ईस्ट इंडिया कंपनी ने कानपुर को जिला घोषित किया था। समय बीता और कानपुर एक औद्योगिक नगरी के तौर पर विकसित होने लगा। ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन और नेशनल टेक्सटाइल कारपोरेशन के अधीन लाल इमली, म्योर मिल, एल्गिन मिल एक और दो, कानपुर टेक्सटाइल, लक्ष्मी रतन कॉटन मिल, अथर्टन मिल, विक्टोरिया मिल, स्वदेशी कॉटन मिल की नींव पड़ी और इन मिलों के उत्पादों ने धूम मचाई।

मैनचेस्टर ऑफ द ईस्ट कहे जाने वाले शहर की इन मिलों में तीन पालियों में कपड़ों का उत्पादन होता था। तीन पाली में एक मिल में लगभग चार से पांच हजार मजदूर काम करते थे। इसके अलावा निजी क्षेत्र की जेके जूट, जेके कॉटन ने रोजगार मुहैया कराया। करीब 20 हजार से ज्यादा श्रमिक इन सभी इकाइयों में काम करते थे। हालांकि जेके जूट मिल का अस्तित्व भी खत्म होने की ओर है। 

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