{"_id":"5900c6f34f1c1bb365c0e347","slug":"story-of-dying-owls-in-kannauj","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"मरती जा रहीं उल्लुओं की तमाम प्रजातियों, अस्तित्व पर संकट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मरती जा रहीं उल्लुओं की तमाम प्रजातियों, अस्तित्व पर संकट
Thu, 27 Apr 2017 08:26 AM IST
अनिल कनौजिया, अमर उजाला, कन्नौज
अनिल कनौजिया, अमर उजाला, कन्नौज
Updated Thu, 27 Apr 2017 08:26 AM IST
विज्ञापन
1 of 6
उल्लुओं के अस्तित्व पर गहराया संकट
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
Link Copied
पुराने जमाने में जंगलों और बागों के पेड़ों पर चहल कदमी करने वाले उल्लू का कुनबा पेड़ों की कमी के कारण अब सिमटता जा रहा है। उल्लू अब गांवों में भी नजर नहीं आ रहे है। ये अब विलुप्त होते जा रहे है। वन्य जीव संरक्षण के तहत तत्परता से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो इस पक्षी के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जाएगा।
पेश है कन्नौज से एक रिपोर्ट...
2 of 6
डेमो पिक
पहले जमाने के गांवों में बाग और जंगलों बड़ी संख्या में हुआ करती थी। पेड़ों की खोह में दिन में अपना आवास बनाकर बसेरा करने वाले उल्लू अब गायब होते जा रहे हैं। उल्लू की कई प्रजातियां रात के समय निकलकर अपने शिकार की तलाश में खेतों में दिखाई दे जाते थे। कभी-कभी गांव के पेड़ों पर बैठकर रात के समय घूं-घूं की आवाज करते थे तो बुजुर्ग लोग आने वाले समय से अपशगुन होने का संकेत मानते थे।
3 of 6
डेमो पिक
गांव वाले कहते हैं कि अब अल्लू बोल नहीं रहा है। अब धीरे-धीरे मानव जाति ने जंगलों को काटकर उल्लुओं के आवासों को छीन लिया है। जिससे इस पक्षी के लिए रहने के लिए खोह नहीं मिल रही। जिस कारण कई बार दिन में उल्लू भटक जाते है और उनका विरोधी कौआ झुंड के रूप में आक्रमण कर उसे मार देता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
4 of 6
डेमो पिक
वहीं दूसरी ओर अब कुछ लोग अंध विश्वास के चलते उल्लू के बीस नाखूनों को काटकर अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए इनको पकड़कर मरने को मजबूर कर रहे है। तालग्राम क्षेत्र में कई दिनों से अमोलर गोड़ी नाले के पास मरे हुए उल्लू देखे जा सकते है। समय रहते वन विभाग की ओर से कोई ठोस कदम न उठाया गया तो इंसान की नजरों से उल्लू पक्षी भी ओझल हो जाएंगे।
विज्ञापन
5 of 6
डेमो पिक
वन रेंजर, गुरसहायगंज एके मिश्रा ने बताया कि वैसे को उल्लू की दर्जनों प्रजातियां होती है। लेकिन अपने कन्नौज क्षेत्र में चार या पांच प्रजातियों के उल्लू पाए जाते है। उनकी संख्या घटने का प्रमुख कारण यह है कि पहले वह बड़े-बड़े पेड़ों पर अपना घोसला बनाकर रहते थे। अब पेड़ गायब हो गए हैं।
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे| Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.
विज्ञापन
विज्ञापन
एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें
Next Article
Disclaimer
हम डाटा संग्रह टूल्स, जैसे की कुकीज के माध्यम से आपकी जानकारी एकत्र करते हैं ताकि आपको बेहतर और व्यक्तिगत अनुभव प्रदान कर सकें और लक्षित विज्ञापन पेश कर सकें। अगर आप साइन-अप करते हैं, तो हम आपका ईमेल पता, फोन नंबर और अन्य विवरण पूरी तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर करते हैं। आप कुकीज नीति पृष्ठ से अपनी कुकीज हटा सकते है और रजिस्टर्ड यूजर अपने प्रोफाइल पेज से अपना व्यक्तिगत डाटा हटा या एक्सपोर्ट कर सकते हैं। हमारी Cookies Policy, Privacy Policy और Terms & Conditions के बारे में पढ़ें और अपनी सहमति देने के लिए Agree पर क्लिक करें।