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पाकिस्तानी सैनिक हुकूमत का दंश झेलने वाली शायरा फहमीदा रियाज़ के चुनिंदा गीत...

Thu, 22 Nov 2018 07:34 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Updated Thu, 22 Nov 2018 07:34 PM IST
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Fahmida riyaz was in meerut india for seven years long famous Song that Affects The Pakistani Army
फ़हमीदा रियाज़

पाकिस्तान की बेबाक शायरा फहमीदा रियाज़ का गुरुवार को लाहौर में निधन हो गया। अपने क्रांतिकारी बोलों की वजह से उन्हें पाकिस्तान की सैनिक हुकूमत का दंश झेलना पड़ा था। इससे भी बड़ी बात यह है कि प्रगतिशील विचारधारा को पाकिस्तान में कभी पनपने नहीं दिया गया। कट्टरपंथी ताकतों और सैनिक शासन का वहां हमेशा से आधिपत्य रहा है। नतीजा यह रहा कि 80 के दौर में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक के शासन में उनको और उनके पति को निर्वासन के बाद भारत में शरण लेनी पड़ी थी।



बता दें कि 28 जुलाई 1945 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में रहने वाले साहित्यिक परिवार में उनका जन्म हुआ। फ़हमीदा रियाज़ पाकिस्तान की बेहद चर्चित कवयित्री रहीं। आज हम आपको रुबरू करा रहे हैं उनकी कुछ चुनिंदा लाइनों से जिन्होंने फहमीदा को पाकिस्तान का सिरमौर बना दिया। 

दिल्ली! तिरी छांव बड़ी क़हरी 
मिरी पूरी काया पिघल रही 
मुझे गले लगा कर गली गली 
धीरे से कहे'' तू कौन है री?'' 

मैं कौन हूँ माँ तिरी जाई हूँ 
पर भेस नए से आई हूँ 
मैं रमती पहुँची अपनों तक 
पर प्रीत पराई लाई हूँ 

तारीख़ की घोर गुफाओं में 
शायद पाए पहचान मिरी 
था बीज में देस का प्यार घुला 
परदेस में क्या क्या बेल चढ़ी 

नस नस में लहू तो तेरा है 
पर आँसू मेरे अपने हैं 
होंटों पर रही तिरी बोली 
पर नैन में सिंध के सपने हैं 

मन माटी जमुना घाट की थी 
पर समझ ज़रा उस की धड़कन 
इस में कारूंझर की सिसकी 
इस में हो के डालता चलतन! 

तिरे आँगन मीठा कुआँ हँसे 
क्या फल पाए मिरा मन रोगी 
इक रीत नगर से मोह मिरा 
बसते हैं जहाँ प्यासे जोगी 

तिरा मुझ से कोख का नाता है 
मिरे मन की पीड़ा जान ज़रा 
वो रूप दिखाऊँ तुझे कैसे 
जिस पर सब तन मन वार दिया 

Fahmida riyaz was in meerut india for seven years long famous Song that Affects The Pakistani Army
फहमीदा रियाज
उनका ये गीत भी काफी मशहूर हुआ।

क्या गीत हैं वो कोह-यारों के 
क्या घाइल उन की बानी है 
क्या लाज रंगी वो फटी चादर 
जो थर्की तपत ने तानी है 

वो घाव घाव तन उन के 
पर नस नस में अग्नी दहकी 
वो बाट घिरी संगीनों से 
और झपट शिकारी कुत्तों की 

हैं जिन के हाथ पर अँगारे 
मैं उन बंजारों की चीरी 
माँ उन के आगे कोस कड़े 
और सर पे कड़कती दो-पहरी ।
Fahmida riyaz was in meerut india for seven years long famous Song that Affects The Pakistani Army
फहमीदा रियाज

मैं बंदी बाँधूँ की बांदी 
वो बंदी-ख़ाने तोड़ेंगे 
है जिन हाथों में हाथ दिया 
सो सारी सलाख़ें मोड़ेंगे 

तू सदा सुहागन हो माँ री! 
मुझे अपनी तोड़ निभाना है 
री दिल्ली छू कर चरण तिरे 
मुझ को वापस मुड़ जाना है।


पाकिस्तान की इन्हें बेहद चर्चित और विवादास्पद शायर माना जाता है। कट्टरपंथी पाकिस्तान में प्रगतिशील विचार रखने वाली फहमीदा रियाज का परिवार मूल रूप से मेरठ का था। उनके पिता 1930 के दौर में पाकिस्तान में सिंध में नौकरी मिलने की वजह से परिवार को वह अपने साथ पाकिस्तान ले गए। इस तरह फहमीदा पाकिस्तान की हो गई। बाद में शादी होने के बाद फहमीदा शौहर के साथ इंग्लैंड में बस गई।

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Fahmida riyaz was in meerut india for seven years long famous Song that Affects The Pakistani Army
फ़हमीदा रियाज़
पथरीले कोहसार के गाते चश्मों में..
वहां के रहन-सहन और आचार-विचार का असर फहमीदा पर पड़ा और वह प्रगतिशील साहित्य की ओर रुख करने लगी। इनकी शादी 1967 में हुई थी। पति के साथ अनबन हुई तो 1973 में पति से तलाक हो गया।

पथरीले कोहसार के गाते चश्मों में 
गूँज रही है एक औरत की नर्म हँसी 

दौलत ताक़त और शोहरत सब कुछ भी नहीं 
उस के बदन में छुपी है उस की आज़ादी 

दुनिया के मा'बद के नए बुत कुछ कर लें 
सुन नहीं सकते उस की लज़्ज़त की सिसकी 

इस बाज़ार में गो हर माल बिकाऊ है 
कोई ख़रीद के लाए ज़रा तस्कीन उस की। 
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Fahmida riyaz was in meerut india for seven years long famous Song that Affects The Pakistani Army
फहमीदा रियाज़

सो जाओ तुम शहज़ादे हो....
सो जाओ तुम शहज़ादे हो 
और कितने ढेरों प्यारे हो 
अच्छा तो कोई और भी थी 
अच्छा फिर बात कहाँ निकली 
कुछ और भी यादें बचपन की 
कुछ अपने घर के आँगन की 
सब बतला दो फिर सो जाओ 
और अपने हाथ को मेरे हाथ में रहने दो 
ये ठंडी साँस हवाओं की 
ये झिलमिल करती ख़ामोशी 
ये ढलती रात सितारों की 
बीते न कभी तुम सो जाओ 
और अपने हाथ को मेरे हाथ में रहने दो।  


इंग्लैंड में पति से तलाक के बाद वह पाक लौट आईं। अपनी मर्जी से दूसरी शादी की और प्रगतिशील साहित्य के लिए कार्य करने लगीं। फहमीदा के दूसरे पति किसान आंदोलन में सक्रिय थे। सिंध से उनका खास नाता था।

जनरल जिया के दौर में वह सिंध आकर रही। वहां उनको काफी मदद मिली। यहां उन्होंने नौकरी भी कर ली। इसी दौरान उन्हें भारत में शरण लेनी पड़ी। पाकिस्तान में मानवीय मूल्यों का लगातार हनन होने पर वह विचलित हो गई थीं। उस दौर में पाकिस्तान की आधी आबादी को गैर मुस्लिम घोषित कर दिया गया।

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