कारगिल युद्ध में 26 जुलाई 1999 को भारतीय सेना ने विजय पताका फहराई थी। दुर्गम रास्ते और परिस्थितियों में अदम्य साहस और समझदारी से सेना ने दुश्मन को पीछे धकेल दिया था। ऑपरेशन विजय में 17 गढ़वाल बटालियन को बटालिक सेक्टर को फतह करने का लक्ष्य दिया गया था। जिसे बटालियन ने सात जुलाई को हासिल कर लिया था। गढ़वाल बटालियन के रिटायर्ड फौजियों की जुबानी आइए जानते हैं इस विजय की कहानी: -
बेजुबान जानवर भी जंग जीतने में आए काम... रिटायर्ड फौजियों की जुबानी, करगिल फतह की कहानी
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बेजुबान जानवर काम आए
पूर्व कैप्टन केएस चौधरी का पाकिस्तानी सैनिकों के साथ आमने-सामने का पाला रहा। पुंछ रजौरी में तैनाती के दौरान पाक की पानी की पाइपलाइन तोड़ी। दुश्मन सामने होता था। पानी भरने के लिए सुबह 9 से 11 बजे का वक्त तय था।
पाकिस्तानी सैनिक उससे पहले ही आ जाते थे। फायरिंग और झड़प आम बात थी। दोनों मुल्क की फौज की टुकड़ी आमने-सामने घात लगाए थी। बीच में भेड़-बकरियों का झुंड था। जिनकी आवाज से दुश्मन की आहट का पता चल जाता था। बेजुबान जानवर जंग में काफी काम आए।
पलटन की बीड़ी छुड़ाई
17 गढ़वाली बटालियन के पहले कमांडिंग ऑफिसर रिटायर लेफ्टिनेंट कर्नल केटीएस शर्मा के मुताबिक गढ़वाल बटालियन एक मई 1982 को बनी। अलग-अलग टुकड़ियों से मिले फौजियों से बटालियन तैयार की गई। शुरू में बटालियन का काम मार्च करने का था। 20 किमी से मार्च की शुरुआत हुई।
उस वक्त जवान बीड़ी बहुत पीते थे। इसका नुकसान यह था कि खांसी होने की वजह से पलटन के मूवमेंट का पता चल जाता था। जवानों की बीड़ी छुड़ा दी तो पलटन आने और जाने की किसी को खबर ही नहीं लगती थी। असम के लोकल प्रशासन में पलटन ने मदद की। भूटान आर्मी को ट्रेनिंग देने के लिए दो बार बटालियन वहां गई।
पहले दिन गंवाईं 12 जान
कारगिल की जंग में सूबेदार आनंद सिंह ने डटकर सामना किया। 31 मई को वह पिथौरागढ़ में थे। सूचना मिलते ही बटालियन रवाना हो गई। तब वह 70 ब्रिगेड में थे। बटालिक सेक्टर के काला पत्थर क्षेत्र में लड़ रहे थे।
सूबेदार आनंद के मुताबिक जंग के पहले दिन 29 जून को एक अफसर और 11 जवान शहीद हो गए थे। बटालियन ने इसका करारा जवाब दिया। दो अधिकारी, जेसीओ और 28 जवान घायल हुए थे।
रिटायर सूबेदार नरेंद्र सिंह की यादें रोंगटे खड़े कर देती हैं। बटालियन का सिर उन्होंने गर्व से ऊंचा किया है। ऑपरेशन पराक्रम में भी कारगिल जैसा माहौल था। आमने-सामने की फायरिंग में मिसाइल से दुश्मनों के कई बंकर सूबेदार नरेंद्र सिंह ने उड़ाए। केरन सेक्टर की तैनाती ऑपरेशन पराक्रम में काम आई। इस दरमियान उनको छह गोली लगीं। एंबुलेंस तक पहुंचने में 12 घंटे लगे। तीन गोली अब भी उनके शरीर में हैं।