बम-बम भोले के उद्घोष से रविवार को शिवालय गूंज उठे। हरिद्वार से गंगाजल लेकर शिवालय पहुंचे कांवड़ियों ने रविवार रात्रि में हाजिरी का जल चढ़ाया वहीं सोमवार सुबह चार बजे से महाशिवरात्रि का जल चढ़ाया गया। मेरठ के काली पलटन स्थित बाबा औघड़नाथ मंदिर, बिलवेश्वर नाथ मंदिर सहित सभी शिवालयों में शिव भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। वहीं बागपत, शामली और मुजफ्फरनगर के इन प्रसिद्ध मंदिरों पर श्रद्धालु बड़ी संख्या में अपनी मुरादें पूरी करने के लिए पहुंच रहे हैं-
महाशिवरात्रि: एतिहासिक मंदिरों में श्रद्धालुओं का जमावड़ा, सभी को मुराद पूरी होने की उम्मीद
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बाबा औघड़नाथ मंदिर संगीनों के साए में दिखाई दिया। सुरक्षा की दृष्टि से सिविल पुलिस और सेना लगाई गई। शाम से ही हरिद्वार से गंगाजल लेकर आए कांवड़ियें मंदिर पहुंचने शुरू हो गए। मंदिर के पुजारी श्रीधर त्रिपाठी का कहना है कि अधिकतर कांवड़ियों ने हाजिरी का जल चढ़ाया है। माना जा रहा है कि महाशिवरात्रि पर एक लाख से भी अधिक शिव भक्त जलाभिषेक करेंगे। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में आने पर शिव भोले अपने भक्तों की हर मनोकामना को पूर्ण करते हैं।
रंग बिरंगी रोशनी में नहाया औघड़नाथ मंदिर
महाशिवरात्रि पर बाबा औघड़नाथ मंदिर रंग बिरंगी लाइटों से जगमग हो गया। रविवार शाम को ही मंदिर में चप्पे-चप्पे पर कैमरे की नजर रही। मंदिर समिति के अध्यक्ष डॉ. महेश बंसल, सतीश सिंहल, अतुल अग्रवाल ने बताया कि समिति के सभी सदस्य शिव भक्तों की सेवा में जुटे हैं। जहां खोया पाया केंद्र बनाया गया है वहीं स्वास्थ्य चिकित्सा कैंप और जूता कैंप भी बनाए गए हैं।
पुरा महादेव की दूर दूर तक है मान्यता
बागपत में पुरा महादेव का प्राचीन नाम परशुरामेश्वर महादेव था। तब महर्षि वाल्मीकि ने परशुराम की प्रार्थना पर हरिद्वार से ले जाए गए पाषाण को शिवलिंग के रूप में स्थापित कर प्राण प्रतिष्ठा कराई। यहां दूर दूर से श्रद्धालु शिवलिंग पर जल चढ़ाने आते हैं। माना जाता है कि पुरा महादेव मंदिर में कदम रखने मात्र से ही सभी कष्ट दूरी हो जाते हैं।
शिव उपासकों का नगर रहा है बिजनौर
बिजनौर भगवान शिव के उपासकों की भूमि है। यहां पुराने मंदिर भगवान शंकर के ही हैं। बिजनौर रामगंगा और पहाड़ों के बीच बसा क्षेत्र प्राचीन काल में आम लोगों से अछूता था। सामाजिक गतिविधियों से दूर यह साधु-संतों की तपस्थलि थी। कण्वाश्रम यहां का प्रसिद्ध आश्रम था। यहीं राजा दुष्यंत को शकुंतला मिली थी। यहीं इनका गंधर्व विवाह हुआ था। सैंधवार महाभारत काल के गुरु द्रोणाचार्य का सैन्य प्रशिक्षण केंद्र था। विदुर कुटी महात्मा विदुर की भूमि है। यहीं भगवान कृष्ण ने एक बार महाभारत काल में भोजन किया था।