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UP: हीरो के कश लगाते हुए डायलॉग, प्यार में निराशा और ये प्रमुख वजह; देखिए कैसे 'नशे के आदी' बन रहे हैं युवा
Fri, 31 Jul 2026 10:16 AM IST
Dhirendra Singh
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Fri, 31 Jul 2026 10:16 AM IST
सार
आगरा के मानसिक स्वास्थ्य संस्थान और एसएन मेडिकल कॉलेज में नशे का इलाज कराने पहुंचने वाले मरीजों में करीब 70 प्रतिशत 18 से 45 वर्ष की उम्र के हैं। कई युवाओं ने फिल्मी हीरो की नकल, स्टाइल दिखाने, प्रेम में निराशा या तनाव के चलते तंबाकू-सिगरेट से शुरुआत की और बाद में महंगे नशे की गिरफ्त में पहुंच गए।
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'नशे के आदी' बन रहे हैं युवा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
फिल्मी हीरो के कश लगाते हुए डायलॉग देखकर स्टाइल दिखाने, प्यार में निराशा या फिर अच्छी नौकरी न मिलने पर नशा शुरू किया। शुरुआत छोटी उम्र में शौकिया की, फिर यह लत बन गई। अब तो लोग कई तरह के महंगे नशे कर रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य संस्थान और एसएन मेडिकल कॉलेज में इलाज कराने पहुंच रहे लोगों में 70 फीसदी युवा हैं।
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मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के निदेशक डॉ. दिनेश राठौर ने बताया कि एंटी एडिक्शन क्लीनिक में रोजाना 25-30 मरीज आ रहे हैं। इसमें 18 से 45 साल के मरीजों की संख्या 70 फीसदी है। इसमें 18-30 की उम्र के युवाओं ने स्टाइलिश दिखने, अपने पसंदीदा हीरो की कॉपी करने, खुद को रफ एंड टफ दिखने, पढ़ाई का तनाव, प्रेम प्रसंग या गलत लोगों के संपर्क में आने पर नशा शुरू करते हैं।
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पूछताछ में पता चला कि अधिकांश ने कक्षा आठ में पढ़ाई के वक्त तंबाकू-सिगरेट का इस्तेमाल किया। इसके बाद सिलसिला बढ़ता गया। दूसरे ग्रुप में 31 से 45 साल के हैं, जो मनमाफिक नौकरी न मिलने, अच्छा पैकेज न मिलने, काम का तनाव, गृह क्लेश परिवार से दूरी समेत अन्य वजहों से नशा शुरू कर देते हैं। बाकी के मानसिक विकार और अन्य वजहों से नशा करते हैं। 18-30 की आयु के मरीज कई तरह के नशे के आदी मिल रहे हैं।
इसमें ये गांजा, भांग, चरस, हेरोइन, ब्राउन शुगर, वल्केनाइजिंग सॉल्यूशन या टायर सीलेंट (पंचर जोड़ने वाला केमिकल), कोडीन कफ सिरप का नशा करते पाए गए। इनकी हालत ज्यादा गंभीर मिल रही है। ऐसे में इनका तीन स्तर पर इलाज किया जाता है। पहले चरण में खून, लिवर समेत अन्य की जांच करते हैं। दूसरे चरण में नशा छोड़ने के बाद होने वाले प्रभावों को दूर करने के लिए दवाएं दी जाती हैं। अंतिम चरण में काउंसलिंग और मोटिवेशन ट्रीटमेंट होता है। टेलीमानस के 14416 पर 24 घंटे ऑनलाइन परामर्श भी मिलता है।
तंबाकू से शुरुआत फिर महंगे नशे
एसएन मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभागाध्यक्ष डॉ. विशाल सिन्हा ने कहा कि एसएन में संचालित नशा मुक्ति केंद्र में 15-20 मरीज रोज आ रहे हैं। इनमें शुरुआत तंबाकू से की, इसके बाद सिगरेट, शराब और चरस, गांजा, अफीम, समेत अन्य महंगा नशा करने लगे। इसमें उच्च शिक्षित मरीज भी हैं। मरीज की दवा और काउंसलिंग से नशे की लत को दूर करते हैं। इसमें नशा छोड़ने के सप्ताह भर में मरीज के चिड़चिड़ापन, बेचैनी, हाथ-पैरों में कंपन, नींद न आना, कमजोरी समेत कई लक्षण उभरने लगते हैं। ऐसे में मरीज को दवाएं दी जाती हैं। छह महीने तक नशा न करने पर आंशिक और साल भर नशा न करने पर ही बीमारी पूरी तरह से ठीक मानते हैं।
एसएन मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभागाध्यक्ष डॉ. विशाल सिन्हा ने कहा कि एसएन में संचालित नशा मुक्ति केंद्र में 15-20 मरीज रोज आ रहे हैं। इनमें शुरुआत तंबाकू से की, इसके बाद सिगरेट, शराब और चरस, गांजा, अफीम, समेत अन्य महंगा नशा करने लगे। इसमें उच्च शिक्षित मरीज भी हैं। मरीज की दवा और काउंसलिंग से नशे की लत को दूर करते हैं। इसमें नशा छोड़ने के सप्ताह भर में मरीज के चिड़चिड़ापन, बेचैनी, हाथ-पैरों में कंपन, नींद न आना, कमजोरी समेत कई लक्षण उभरने लगते हैं। ऐसे में मरीज को दवाएं दी जाती हैं। छह महीने तक नशा न करने पर आंशिक और साल भर नशा न करने पर ही बीमारी पूरी तरह से ठीक मानते हैं।
प्रधानमंत्री 2 अगस्त से शुरू कर रहे अभियान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2 अगस्त से नशे के खिलाफ 100 सप्ताह का विशेष अभियान शुरू करने जा रहे हैं। इसमें युवाओं में बढ़ते नशे की लत से बचाने के लिए चरणबद्ध कार्यक्रम होंगे। इसके लिए एसएन और मानसिक स्वास्थ्य संस्थान में भी तैयारियां की हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2 अगस्त से नशे के खिलाफ 100 सप्ताह का विशेष अभियान शुरू करने जा रहे हैं। इसमें युवाओं में बढ़ते नशे की लत से बचाने के लिए चरणबद्ध कार्यक्रम होंगे। इसके लिए एसएन और मानसिक स्वास्थ्य संस्थान में भी तैयारियां की हैं।
इन बातों का ध्यान रखें
- कक्षा आठ से ही नशाखोरी के खिलाफ बच्चों को स्कूलों में बताया जाए।
- बच्चों के मित्रों और उसके कार्योें पर सकारात्मक रूप से नजर रखें।
- बच्चों-युवाओं के व्यवहार में बदलाव, पढ़ाई-कार्यशैली में बदलाव आना।
- कक्षा आठ से ही नशाखोरी के खिलाफ बच्चों को स्कूलों में बताया जाए।
- बच्चों के मित्रों और उसके कार्योें पर सकारात्मक रूप से नजर रखें।
- बच्चों-युवाओं के व्यवहार में बदलाव, पढ़ाई-कार्यशैली में बदलाव आना।