AMU: 10 में 9 प्रसव सरकारी अस्पतालों में, फिर भी 7 गर्भवती तीसरी खुराक से दूर, न ही लगाया कोई टीका
एएमयू के गृह विज्ञान विभाग के इस अध्ययन में पता चला कि 88% गर्भवती महिलाओं ने टिटनेस की पहली खुराक ली, लेकिन दूसरी खुराक 53% और तीसरी खुराक 29% ने ली। आंकड़ों का यह अंतर कई तरह के सवाल खड़े कर रहा है।
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जननी सुरक्षा को लेकर अलीगढ़ की चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। 10 में से नौ महिलाओं ने प्रसव के लिए सरकारी अस्पतालों को चुना, लेकिन सात गर्भवती ने टिटनेस की तीन खुराक का कोर्स पूरा नहीं किया। इसके अलावा, गर्भावस्था की पहली तिमाही में 66 फीसदी ने डॉक्टर से सलाह नहीं ली और न ही कोई टीका लिया, जबकि गर्भ का ठहरना, भ्रूण का विकास और एनआईपीटी जैसी जांच बहुत जरूरी है।
पहली बार जिले के 250 परिवारों पर एएमयू का शोध सामने आया है जिसमें मां से मिले जवाबों से शोधकर्ताओं ने यह सच्चाई पता की है कि कई महिलाएं प्रसव पूर्व चिकित्सा जांच नहीं कराती हैं। 44 फीसदी महिलाएं गर्भावस्था के पांचवें महीने में जाकर जांच करवाती हैं, लेकिन तब तक काफी देर भी हो जाती है।
आमतौर पर गर्भावस्था में टिटनेस के दो टीके लगाए जाते हैं लेकिन कई मामलों में तीसरी खुराक भी जरूरी होती है। गर्भवती महिला को 40 सप्ताह में दो या तीन खुराक लेनी है, इसका फैसला डॉक्टर लेता है। एएमयू के गृह विज्ञान विभाग के इस अध्ययन में पता चला कि 88 फीसदी गर्भवती महिलाओं ने टिटनेस की पहली खुराक ली, लेकिन दूसरी खुराक 53 फीसदी और तीसरी खुराक 29 फीसदी ने ली। आंकड़ों का यह अंतर कई तरह के सवाल खड़े कर रहा है।
इन गांवों में महिलाओं ने बताई सच्चाई
शोधकर्ताओं ने जिले के पांच गांवों में 250 परिवारों की गर्भवती व स्तनपान कराने वाली महिलाओं को अध्ययन में शामिल किया। इनमें भीमगढ़ी 35, जारौठ 34, मिर्जापुर 38, सुमैरा दरियापुर 127 और फरीदपुर से 16 महिलाएं शामिल हैं। विभागाध्यक्ष प्रो. सबा खान की निगरानी में शोधार्थी अर्चना गुप्ता ने जेएन मेडिकल काॅलेज के अलावा पंडित दीनदयाल उपाध्याय संयुक्त चिकित्सालय सहित अन्य स्वास्थ्य केंद्रों पर आने वाली महिलाओं पर अध्ययन किया।
क्यों छूट रही हैं खुराक
प्रो. सबा खान ने बताया कि आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं के जरिए घर-घर जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है। साथ ही मातृ एवं शिशु सुरक्षा कार्ड पर टीकाकरण की पूरी जानकारी दी जानी चाहिए ताकि कोई भी डोज छूट न जाए। उन्होंने कारण गिनाते हुए बताया कि टीकाकरण के पूरे शेड्यूल की जानकारी का अभाव, अस्पतालों में लंबा इंतजार, स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच की दिक्कत, सामाजिक मान्यताएं और लापरवाही है। सरकारी अस्पतालों में प्रसव बढ़ा है, लेकिन फॉलोअप सेवाओं में कमी दिखाई दे रही है जो निरंतर निगरानी और जागरूकता बढ़ाने का संकेत है।