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बुजुर्गों की थाली खाली: एएमयू ने किया अध्ययन, बीमारी-अकेलापन और गरीबी बढ़ा रहे भूख का संकट

परीक्षित निर्भय, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: Chaman Kumar Sharma Updated Tue, 21 Apr 2026 12:09 PM IST
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सार

फूड एंड ह्यूमैनिटी जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, करीब 38.2 फीसदी बुजुर्ग हल्की खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं, जबकि 5 फीसदी बुजुर्गों की स्थिति गंभीर है। यह अध्ययन देशभर के 31 हजार से अधिक बुजुर्गों के आंकड़ों पर आधारित है, जो इस समस्या की व्यापकता को बयां कर रहा है।

Hunger crisis in the elderly
एएमयू - फोटो : संवाद
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विस्तार

बुजुर्गों की भूख अब सिर्फ रोटी की कमी का सवाल नहीं रह गई है, बल्कि यह बीमारी, अकेलेपन और आर्थिक तंगी का संयुक्त संकट बनती जा रही है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के एक हालिया अध्ययन में यह बात सामने आई है कि देश में बड़ी संख्या में बुजुर्ग किसी न किसी स्तर पर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं।

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फूड एंड ह्यूमैनिटी जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, करीब 38.2 फीसदी बुजुर्ग हल्की खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं, जबकि 5 फीसदी बुजुर्गों की स्थिति गंभीर है। यह अध्ययन देशभर के 31 हजार से अधिक बुजुर्गों के आंकड़ों पर आधारित है, जो इस समस्या की व्यापकता को बयां कर रहा है। प्रदेश में भी स्थिति अलग नहीं है। अलीगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में ऐसे कई बुजुर्ग मिलते हैं जो या तो अकेले रह रहे हैं या परिवार के सहयोग से वंचित हैं। ग्रामीण इलाकों में खेती से दूरी और शहरी क्षेत्रों में अकेलापन, दोनों ही हालात भोजन की उपलब्धता को प्रभावित कर रहे हैं।
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आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश (10.47%) इस सूची में सबसे ऊपर है, जहां हर दस में से एक बुजुर्ग गंभीर भूख की स्थिति में है। इसके बाद झारखंड (8.17%), तमिलनाडु (7.93%), बिहार (7.88%) और पश्चिम बंगाल (7.55%) का स्थान है। उत्तर प्रदेश में यह संख्या 7.13% है। इन राज्यों में राष्ट्रीय औसत 5.14 प्रतिशत से काफी अधिक बुजुर्ग गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहे हैं, जो क्षेत्रीय असमानताओं और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों को उजागर करता है। आंकड़े ये भी बताते हैं कि मुस्लिम और ईसाई समुदायों के बुजुर्गों में खाद्य असुरक्षा का स्तर अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि हिंदू और सिख समुदायों में स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर पाई गई।

भूगोल विभाग के शोधकर्ताओं का कहना है कि हर पांच में से एक बुजुर्ग किसी न किसी स्तर पर भोजन की असुरक्षा से जूझ रहा है। सरकारी योजनाएं जैसे वृद्धावस्था पेंशन और राशन कार्ड मौजूद हैं, लेकिन कई बुजुर्गों तक लाभ समय पर नहीं पहुंचता। इसमें पहचान और पंजीकरण की दिक्कत के अलावा पोषण पर खास फोकस की कमी देखी जा रही है। अगर समय रहते स्थानीय स्तर पर पहचान और मदद की व्यवस्था मजबूत नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गहरी हो सकती है।

बीमारी के साथ भूख की दोहरी मार
एक तरफ गांवों में बुजुर्ग खेती से अलग हो रहे हैं और दूसरी ओर शहरों में अकेले रहने वाले बुजुर्गों के सामने भोजन की समस्या पैदा हो रही है। इनमें से अगर बीमार बुजुर्गों की बात करें तो बीमार और चलने-फिरने में असमर्थ लोगों की स्थिति सबसे खराब है। शोधकर्ता सैयद नौशाद अहमद और मो मोहसिन ने अध्ययन में बताया कि कई बुजुर्ग दवाइयों और इलाज पर खर्च के कारण भोजन पर कटौती कर देते हैं। इसका नतीजा है कि बुजुर्गों में कमजोरी बढ़ रही है। बीमारियां और गंभीर होती जा रही हैं और काम करने की क्षमता खत्म हो रही है।

सिर्फ गरीबी नहीं, कई कारण जिम्मेदार
शोध में सामने आया है कि बुजुर्गों में भूख का संबंध केवल आय से नहीं है। खराब स्वास्थ्य और चलने-फिरने में दिक्कत, मानसिक अवसाद और अकेलापन, परिवार से दूरी या सहारा न होना, सामाजिक और आर्थिक असमानता जैसे कारक मिलकर बुजुर्गों को भोजन से वंचित कर रहे हैं।

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