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आक्रामकता के शिकार मासूम: बच्चों पर न करें गुस्सा-उपेक्षा, जेन जी के बॉस नहीं, भरोसा बनें मां-बाप

अभिषेक शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: Chaman Kumar Sharma Updated Thu, 04 Jun 2026 03:55 PM IST
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सार

डिजिटल पीढ़ी अपनी बात खुलकर कहना चाहती है। माता-पिता से सुने जाने की उम्मीद रखती है। गुस्सा, उपेक्षा या अत्यधिक नियंत्रण उन्हें भावनात्मक रूप से आहत करते हैं। यह चिंता महानगरों तक सीमित नहीं है। अलीगढ़ के परामर्श केंद्रों पर ऐसे परिवारों की संख्या बढ़ रही है। बच्चों का व्यवहार रिश्तों में दूरी और संवादहीनता दर्शाता है।

innocent victims of aggression
मां-बाप और बच्चा - फोटो : एआई व संवाद
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विस्तार

डिजिटल दौर की यह पीढ़ी अपनी बात खुलकर रखना चाहती है और माता-पिता से अपनी बात सुने जाने की उम्मीद भी करती है। ऐसे में गुस्सा, उपेक्षा या फिर अत्यधिक नियंत्रण इन्हें भावनात्मक रूप से आहत कर सकते हैं। यह चिंता केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। अलीगढ़ के काउंसलिंग केंद्रों पर भी ऐसे परिवारों की संख्या बढ़ रही है, जहां बच्चों का व्यवहार व रिश्तों में बढ़ती दूरी और संवादहीनता की कहानी कह रहा है। इन्हीं में से कुछ कहानियों के साथ आक्रामकता के शिकार मासूम बच्चों के अंतरराष्ट्रीय दिवस पर अभिषेक शर्मा की यह विशेष रिपोर्ट...

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संवाद : जब मां ने नहीं सुनी मन की बात
अलीगढ़ के स्वर्ण जयंती नगर में नौ वर्षीय बच्ची को लगा कि मां अब उसे पहले जैसा प्यार नहीं करती। उसकी भावनाएं अनसुनी होती रहीं और धीरे-धीरे वह चिड़चिड़ी व गुस्सैल हो गई। परिवार उसे काउंसलिंग के लिए ले गया। बातचीत में पता चला कि स्कूल से लौटते समय मां का पूरा ध्यान छोटे भाई और अन्य महिलाओं से बातचीत में रहता था। यह मामला बताता है कि बच्चों के साथ नियमित और संवेदनशील संवाद कितना जरूरी है।
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सुरक्षा : जब एहसास डर में बदला
मामू-भांजा के 12 वर्षीय बच्चे के लिए मां का गुस्सा रोजमर्रा की बात बन गया था। घरेलू तनाव का असर उसपर उतरता रहा और मारपीट व अपमान बढ़ते गए। आखिरकार उसका व्यवहार भी आक्रामक हो गया। यह मामला बताता है कि जब बच्चे की भावनात्मक सुरक्षा कमजोर पड़ती है, तो उसका असर सीधे उसके व्यवहार पर दिखाई देता है।

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सहारा : बच्चे पर नहीं दिया ध्यान
मैरिस सड़क के एक परिवार में मां का अधिकांश समय मोबाइल पर बीतने लगा। तनाव और चिड़चिड़ेपन का असर बच्चे पर पड़ा। संवाद कम हुआ और डांट-फटकार बढ़ती गई। नतीजा यह हुआ कि बच्चे के मन में डर, असुरक्षा और गुस्सा घर करने लगा। यह मामला बताता है कि बच्चों को सुविधाओं से ज्यादा भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है।

संवेदना : 24 साल में भी नफरत नहीं गई
अलीगढ़ के परिवार में 24 वर्षीय युवक अपनी मां को पसंद नहीं करता। काउंसलिंग में वजह पूछने पर बचपन की एक घटना सामने आई, जब गुस्से में मां ने उसे गर्म चिमटे से पीटा था। वर्षों बाद भी वह घटना उसके मन में जिंदा थी। विशेषज्ञों का कहना है कि बचपन में मिली शारीरिक या भावनात्मक चोटें कई बार उम्रभर व्यक्ति के व्यक्तित्व और रिश्तों को प्रभावित करती हैं।

संस्कार : घर में जो देखते हैं, वही सीखते हैं बच्चे
मनोवैज्ञानिक डाॅ.पूनम बत्रा बताती हैं कि बच्चे वही सीखते हैं, जो घर में देखते हैं। गुस्सा, अपमान और हिंसा उन्हें आक्रामक बना सकती है, जबकि सम्मान, धैर्य और संवाद उन्हें संवेदनशील व्यक्तित्व देता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मां-बाप बच्चों के बॉस नहीं, बल्कि उनके सबसे भरोसेमंद साथी बनें। क्योंकि बचपन में मिला भरोसा जीवनभर ताकत बनता है और बचपन में मिला डर कई बार पूरी उम्र पीछा नहीं छोड़ता।

माता-पिता के लिए जरूरी सुझाव

  • 12 वर्ष तक की आयु में परिवार ही बच्चे का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच होता है।
  • माता-पिता और बच्चों के बीच खुला संवाद मजबूती देता है।
  • बच्चों के साथ समय बिताएं, उनकी सुने, उनके सवालों पर गौर करें।
  • अनुशासन जरूरी है, लेकिन अनुशासन और नियंत्रण के बीच फर्क भी समझें।
  • अपनी पसंद बच्चों पर नहीं थोपना चाहिए।

नोट : बच्चों और उनके परिवारों की निजता की रक्षा के लिए मनोवैज्ञानिक की सलाह पर उनकी पहचान गोपनीय रखी गई है।

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