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अखाड़ों का अतीत : प्रयाग की रक्षा के बाद नागाओं ने महाकुंभ में किया था नगर प्रवेश, स्वागत में उमड़ पड़ा था शहर

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 19 Dec 2024 04:27 PM IST
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सार

प्रयागराज पर अफगानी आक्रांताओं से नागाओं के युद्ध से जुड़ी यह घटना 17वीं शताब्दी के बाद की है। इसका उल्लेख श्रीमहंत लालपुरी ने अपनी पुस्तक ''''दशनाम नागा संन्यासी'''' में किया है। यह युद्ध दशनामी परंपरा के नागा योद्धा राजेंद्र गिरि के नेतृत्व में लड़ा गया था।

After protecting Prayag, Nagas entered the city in Mahakumbh, the city was filled with enthusiasm to welcome
नगर प्रवेश के दौरान करतब दिखाता नागा साधु। सांकेतिक चित्र - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार

महाकुंभ में अखाड़ों के नगर प्रवेश की परंपरा नागा संन्यासियों के सदियों पुराने पराक्रम की गौरव गाथा से जुड़ी है। दशनामी नागाओं ने अफगानी आक्रांताओं से प्रयाग की रक्षा की थी। उनके स्वागत में ढोल-नगाड़ों के साथ पूरा शहर उमड़ पड़ा था। उसी शौर्य को यादगार बनाने के लिए अखाड़े नगर प्रवेश करते आ रहे हैं।

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प्रयागराज पर अफगानी आक्रांताओं से नागाओं के युद्ध से जुड़ी यह घटना 17वीं शताब्दी के बाद की है। इसका उल्लेख श्रीमहंत लालपुरी ने अपनी पुस्तक ''''दशनाम नागा संन्यासी'''' में किया है। यह युद्ध दशनामी परंपरा के नागा योद्धा राजेंद्र गिरि के नेतृत्व में लड़ा गया था।
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महंत लालपुरी लिखते हैं कि राजेंद्र गिरि उस समय झांसी से 32 मील दूर मोठ नामक स्थान पर नागाओं को संगठित किया था। उन्होंने 114 गांवों पर अपना अधिकार कर दुर्ग का निर्माण भी करा लिया था। उनकी लगातार बढ़ी ताकत से अफगानी और बंगश रोहिले चिंतित थे।

उस दौरान प्रयाग में अफगानों के अत्याचार और क्रूर हमले बढ़ गए थे। लालपुरी ने अपनी पुस्तक के 15वें अध्याय अखाड़े के नागा संन्यासी एवं युद्ध में इस घटना का वर्णन किया है। लिखा है.. तब प्रयाग में अफगानों के अत्याचार से जनता त्रस्त थी। दिनदहाड़े लूटमार सामान्य बात थी। आत्मसम्मान बचाना तक मुश्किल था। बहन, बेटियां तक सुरक्षित नहीं रह गईं थीं। लोग पलायन को विवश थे। पुस्तक के मुताबिक, मुगलों के शाही तख्त पर अहमदशाह बैठा था। उसने अवध के नवाब सफदरजंग को अपना नवाब बना लिया। इससे अफगान उसके विरोधी हो गए।

अफगानों ने फर्रुखाबाद के निकट राम चौतनी नामक स्थान पर सफदरजंग को शिकस्त देकर प्रयाग नगर को घेर लिया। उस समय प्रयाग के दुर्ग रक्षक अल्प संख्या में होने के कारण नगर की रक्षा करने में असमर्थ साबित हो रहे थे। इससे जनता में हाहाकार मच गया। यह पता लगने पर राजेंद्र गिरि ने नागा संन्यासियों की विशाल वाहिनी लेकर अफगानों की घेराबंदी की और लोगों को उनके अत्याचार से मुक्त कराया।

इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार ने राजेंद्र गिरि के शिष्य उमराव गिरि और अनूप गिरि के पराक्रम का जिक्र दशनाम नागा संन्यासियों का इतिहास नामक अपनी पुस्तक में किया है। महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव महंत रवींद्र पुरी बताते हैं कि नगर प्रवेश की परंपरा नागा संन्यासियों के शौर्य और पराक्रम से जुड़ी है। अफगानियों से प्रयाग की रक्षा के बाद नागाओं ने बाजेगाजे के साथ नगर प्रवेश किया था।

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