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‘प्रयाग प्रशस्ति’ के गान वाला अशोक स्तंभ भी किले में कैद

Sat, 22 Dec 2018 01:59 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज
अमर उजाला ब्यूरो, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 22 Dec 2018 01:59 AM IST
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Ashoka pillar of 'Prayag Prashasti' also imprisoned in the fort
प्रयागराज - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो,प्रयागराज
यमुना किनारे स्थित अकबर के किले में ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ‘अशोक स्तंभ’ भी है। मिर्जापुर के लाल बलुआ पत्थरों को तराश कर तैयार किए गए स्तंभ पर सम्राट अशोक से लेकर जहांगीर तक के शासन काल की उपलब्धियों से जुड़ी सूचनाएं दर्ज हैं। कहते हैं, आरंभ में यह स्तंभ कौशाम्बी में था ताकि आते-जाते हुए लोग उसे पढ़ सकें। इसे बाद में जहांगीर ने कौशाम्बी से लाकर किले में रखवाया था। यह तकरीबन 35 मीटर ऊंचा है। पहली बार एक अंग्रेज अफसर की ओर से सन 1834 में इसके  बारे में जानकारी दी गई थी।
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शुरुआत सम्राट अशोक से करें तो इस विशिष्ट स्तंभ पर उसकी दूसरी महारानी कारूवाकी की ओर से कौशाम्बी के एक बौद्ध विहार को आम की बगिया दान में देने का उल्लेख है। इसके बाद इस पर समुद्रगुप्त के सांधिविग्रहिक ‘शिला लेखक’ हरिषेण की ओर से संस्कृत भाषा और गुप्तकालीन ब्राह्मी लिपि में 56 पंक्तियों में ‘प्रयाग प्रशस्ति’ उत्कीर्ण है। इसमें उसकी उत्तर से दक्षिण तक की दिग्विजयों,  विदेश नीति आदि की जानकारी दर्ज है।
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इलाहाबाद संग्रहालय के शैक्षिक प्रभारी डॉ.राजेश मिश्र कहते हैं, ‘प्रयाग प्रशस्ति’ यह भी बताती है कि समुद्रगुप्त पहला ऐसा सम्राट है, जो अपनी शक्तियों का विकेंद्रीकरण करता है। उसने राज्यों को जीतकर फिर उन्हें उनके राज्य में स्वतंत्र कर दिया, इस शर्त के साथ कि जब कभी उसकी ओर से गरुण मुद्रा वाली कोई राजाज्ञा जारी की जाएगी तो सभी उसका पालन करेंगे। प्रशस्ति पर उन राजाओं के नामों का भी उल्लेख है। साथ ही यह भी कि शक कन्याओं का विवाह राजवंश में ही होगा। इसी तरह छोटे-छोटे द्वीपों के वासी परिचारक बनेंगे।
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अशोक स्तंभ पर किसी गांव का भूराजस्व माफ करने से संबंधित फारसी में जहांगीर का भी अभिलेख है। चूंकि जहांगीर ने प्रयाग प्रशस्ति पर ही इसे दर्ज करवा दिया, ऐेसे में प्रशस्ति की आरंभिक चौदह लाइनें अस्पष्ट हो गई हैं। इससे पहले अशोक के अभिलेख के दूसरी ओर ही प्रयाग प्रशस्ति उत्कीर्ण की गई थी,जिससे उसका कोई नुकसान नहीं हुआ था। दरअसल अशोक और समुद्रगुप्त दोनों के काल की लिपियां ब्राह्मी हैं। अशोक के समय भाषा पालि और समुद्रगुप्त के समय भाषा संस्कृत थी लेकिन, एक लिपि होने के कारण वे पढ़ी जा सकी थीं।
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