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High Court : वैवाहिक विवाद में बच्चों का मोहरा बनना चिंताजनक और खतरनाक भी, पिता और ताऊ उम्रकैद की सजा से बरी

Sun, 16 Aug 2026 06:26 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 16 Aug 2026 06:26 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक, संपत्ति और बच्चे की कस्टडी को लेकर रिश्तों में आई कड़वाहट में नाबालिग बच्चों को मोहरा नहीं बनाया जाना चाहिए। यह प्रवृत्ति न केवल चिंताजनक है बल्कि खतरनाक भी है।

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High Court: Children being used as pawns in matrimonial disputes is both concerning and dangerous
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक, संपत्ति और बच्चे की कस्टडी को लेकर रिश्तों में आई कड़वाहट में नाबालिग बच्चों को मोहरा नहीं बनाया जाना चाहिए। यह प्रवृत्ति न केवल चिंताजनक है बल्कि खतरनाक भी है। लिहाजा, अदालतों को बच्चों की गवाही पर भरोसा करते वक्त सतर्कता बरतनी चाहिए।

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इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने सात साल की बच्ची संग दुष्कर्म के आरोप में उम्रकैद की सजा पाए कार्डियोलॉजिस्ट पिता और ताऊ को बरी कर दिया है। उन्हें वाराणसी की विशेष अदालत ने 2025 में उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

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मामला वाराणसी के डॉक्टर दंपती के बीच उपजे वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। पति-पत्नी एक ही मेडिकल कॉलेज में साथ काम करते थे। इसी दौरान उपजा मन मुटाव वैवाहिक विवाद में तब्दील हो गया। सीनियर रेजिडेंट पत्नी ने हल्द्वानी निवासी पति और जेठ के खिलाफ 2018 में एफआईआर दर्ज कराई। आरोप लगाया कि मार्च-अप्रैल में जब उनकी सात वर्षीय बेटी अपने पिता के साथ हल्द्वानी गई थी, तब पिता और उसके ताऊ ने दुष्कर्म किया।

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वाराणसी की विशेष अदालत ने दोनों को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ दोनों ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। कोर्ट ने 61 पेज के अपने फैसले में पॉक्सो एक्ट के दुरुपयोग का हवाला देते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया।

कोर्ट ने पाया कि एफआईआर दर्ज कराने में दो महीने से अधिक की देरी हुई। इस दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि एफआईआर से पहले ई-मेल के जरिये दोनों के बीच बातचीत हुई थी। पति की ओर से तलाक की कार्रवाई भी शुरू की गई थी। शुरुआती बातचीत में बच्ची के दुष्कर्म का कोई जिक्र नहीं आया।

कोर्ट ने यह भी पाया कि मेडिकल रिपोर्ट आरोपों का समर्थन नहीं करती। मेडिकल रिपोर्ट में बच्ची के शरीर पर ऐसी चोट, ट्रॉमा या रक्तस्राव नहीं मिला, जिससे लगाए गए गंभीर यौन हमले के आरोपों की पुष्टि हो सके। कोर्ट ने बच्ची की गवाही पर सवाल उठाए। कहा कि उसकी गवाही महत्वपूर्ण जरूर है लेकिन बाल मन अत्यंत संवेदनशील होता है। जिस अभिभावक के साथ वह लगातार रहता है उसके विचार, शिकायतें और दूसरे अभिभावक के खिलाफ चल रहा विवाद उसके मन पर प्रभाव डाल सकता है।

ऐसे माहौल में बच्चा ऐसी बातों को भी सच मानकर दोहरा सकता है जो वास्तव में उसके स्वयं के अनुभव का हिस्सा नहीं हों। कोर्ट को ताऊ के खिलाफ भी भरोसेमंद साक्ष्य नहीं मिला। लिहाजा, कोर्ट ने माना कि उन्हें पारिवारिक विवाद के कारण मामले में घसीटा गया।

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