High Court : जमानत मंजूर होने के बाद गरीबी-लाचारी रिहाई में बाधक नहीं, हाईकोर्ट ने दिया अहम फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कई मामलों में जमानत मंजूर होने के बाद गरीबी और सामाजिक लाचारी उसकी रिहाई में बाधक नहीं बन सकती। रिहाई के लिए उसे सभी मामलों में अलग-अलग जमानतदार पेश करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कई मामलों में जमानत मंजूर होने के बाद गरीबी और सामाजिक लाचारी उसकी रिहाई में बाधक नहीं बन सकती। रिहाई के लिए उसे सभी मामलों में अलग-अलग जमानतदार पेश करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की एकल पीठ ने कानपुर नगर के कमलेश कुमार उर्फ कमलेश फाइटर की याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने याची को 10 आपराधिक मामलों में मिली जमानत के बाद एक लाख रुपये का एक व्यक्तिगत बॉन्ड दाखिल करने के साथ ही समान रकम के दो जमानतदार पेश करने पर सभी रिहाई का आदेश दिया है।
अब याची को सभी मामलों में अलग-अलग बॉन्ड और जमानतदार पेश नहीं करने होंगे। हालांकि, यह शर्त रहेगी कि दो में से एक जमानतदार याची के परिवार का होगा, जबकि एक स्थानीय निवासी। कानपुर नगर के स्वरूप नगर, नजीराबाद, कर्नलगंज, जाजमऊ, रावतपुर, काकादेव, कोतवाली थाने में दर्ज 10 मुकदमों में आरोपी याची की जमानत मंजूर होने के बाद सभी मामलों में अलग-अलग जमानतदार पेश नहीं पेश करने के कारण रिहाई नहीं हो पा रही थी। इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि याची बेहद गरीब है। वह सभी 10 मामलों में अलग-अलग बॉन्ड और जमानतदार पेश करने में सक्षम नहीं है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हनी निषाद के मामले का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि न्याय की अवधारणा केवल कागजी आदेशों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसका व्यावहारिक रूप से सुलभ होना भी उतना ही आवश्यक है।