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नाबालिग को मिली सजा भविष्य की राह में रोड़ा नहीं, इस आधार पर उसे सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य ठहराना अनुचितः हाईकोर्ट

Fri, 10 Apr 2020 05:20 PM IST
अमर उजाला लोकल ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: अमर उजाला लोकल ब्यूरो Updated Fri, 10 Apr 2020 05:20 PM IST
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इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

इलाहाबाद हाईकोर्ट में कहा है कि नाबालिक को आपराधिक मामले में मिली सजा उसके भविष्य की राह में रोडा नहीं बन सकती है । नाबालिक को मिली सजा के आधार पर उसको सरकारी सेवा में नियुक्ति के अयोग्य ठहराना अनुचित है। कोर्ट ने कहा कि नाबालिगों के मामले में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की मंशा एकदम साफ है कि नाबालिक को मिली सजा उसकी अयोग्यता नहीं मानी जाएगी ।

 

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Allahabad High Court

मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति समित गोपाल की पीठ ने कांस्टेबल भर्ती 2015 के अभ्यर्थी शिवम मौर्य की नियुक्ति इस आधार पर रद्द करने संबंधी आदेश निरस्त कर दिया है तथा उसे 30 दिन के भीतर सेवा में वापस लेने का आदेश दिया है। कोर्ट ने अपील पर अपना निर्णय 24 फरवरी को सुरक्षित कर लिया था, जिसे 10 अप्रैल को सुनाया गया। खंडपीठ ने इस मामले में एकल न्याय पीठ के 5 मार्च 2018 के मार्च 2018 के आदेश को भी रद्द कर दिया है।

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Allahabad High Court - फोटो : PTI

मामले के अनुसार अभ्यर्थी शिवम मौर्य ने सिपाही भर्ती 2015 ने सिपाही भर्ती 2015 के लिए आवेदन किया था। लिखित परीक्षा, शारीरिक दक्षता परीक्षा और मेडिकल परीक्षण में सफल रहा ।दस्तावेजों के सत्यापन के बाद उसे इस आशय का हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा गया कहा गया लिए कहा गया कहा गया कि वह कभी किसी आपराधिक मामले में आपराधिक मामले में मामले कभी किसी आपराधिक मामले में किसी आपराधिक मामले में मामले में शामिल नहीं रहा है ना ही उस पर कोई मुकदमा दर्ज है।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट

शिवम द्वारा इस आशय का हलफनामा दिए जाने के बाद जब उसकी जांच कराई गई तो पता चला कि वह मारपीट, गंभीर चोट पहुंचाने के मामले मे उसके खिलाफ 28 जून 2013 को प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी जिसमें उसे जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने 1 साल की सजा और ₹35000 का जुर्माना सुनाया था। अधिकारियों ने हलफनामे में गलत जानकारी दिए जाने के आधार पर उसकी नियुक्ति नियुक्ति नियुक्ति नियुक्ति रद्द कर उसे सेवा से बाहर कर दिया था ।


इस आदेश को को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई । एकल न्याय पीठ ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी याची ने मुकदमा दर्ज होने की जानकारी छिपाई है इसलिए उसे राहत नहीं दी जा सकती है। एकल पीठ के फैसले को अपील में चुनौती दी गई । अपील पर सुनवाई करते हुए खंड पीठ ने कहा कि घटना के समय याची मात्र 16 साल का था ।जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में स्पष्ट प्रावधान है।

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allahabad high court

प्रावधान है है की नाबालिग को दी गई सजा की वजह से उसके जीवन में दुष्परिणाम भुगतना पड़े ।इसलिए सजा संबंधी दस्तावेज एक निश्चित समय समाप्त कर दिए जाते हैं ।इस संबंध में कानून की मंशा साफ है कि नाबालिक को मिली मिली सजा उसके जीवन निर्वाह में कभी आड़े ना आए। उसे मिली सजा उसकी अयोग्यता नहीं मानी जाएगी। इसलिए सजा मिलने का तथ्य छुपाए जाने का कोई अर्थ नहीं है। संबंधित अधिकारी यह समझने में नाकाम रहे कि याची जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के प्रावधानों का लाभ पाने का अधिकारी है।

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