Loksabha election : भाजपा संगठन की सिर्फ होती रहीं बैठकें, दावे निकले हवा-हवाई, अध्यक्षों की कार्यशैली पर सवाल
विधानसभावार यह प्रदर्शन इलाहाबाद लोकसभा का है। लोकसभा चुनाव के परिणाम ने इस बार हर किसी को चौंका गया। यह हाल तब है कि जब भाजपा का संगठन अन्य पार्टियों के मुकाबले ज्यादा बड़ा है। बावजूद इसके यहां पार्टी लोकसभा की दोनों सीटों पर आशा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सकी।
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मेजा विधानसभा क्षेत्र में भाजपा 70034 तो कांग्रेस 87177, करछना में भाजपा 80032 तो कांग्रेस 99280, कोरांव में भाजपा 86422 तो कांग्रेस 98806, बारा में भाजपा 79442 तो कांग्रेस 96466 एवं इलाहाबाद दक्षिणी में भाजपा 86312 तो कांग्रेस को 79381 मत मिले। विधानसभावार यह प्रदर्शन इलाहाबाद लोकसभा का है। लोकसभा चुनाव के परिणाम ने इस बार हर किसी को चौंका गया। यह हाल तब है कि जब भाजपा का संगठन अन्य पार्टियों के मुकाबले ज्यादा बड़ा है। बावजूद इसके यहां पार्टी लोकसभा की दोनों सीटों पर आशा के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर सकी। फूलपुर भले ही भाजपा मामूली अंतर से जीत गई हो, लेकिन वहां भी पार्टी का प्रदर्शन एक तरह से फीका ही रहा।
लोकसभा चुनाव के दौरान इलाहाबाद और फूलपुर को लेकर अन्य दलों के मुकाबले भाजपा संगठन की ज्यादा बैठकें हुईं। पार्टी के स्टार प्रचारक, संगठन के पदाधिकरियों की भी यहां लगातार आवाजाही रही। इतना सब होने के बाद भी न ही मतदान का प्रतिशत बढ़ा और न ही पार्टी अपनी इलाहाबाद सीट जीत सकी। फूलपुर में बड़ी जीत का दावा किया जा रहा था, लेकिन यहां बमुश्किल 4300 वोट से ही भाजपा जीत सकी। वहीं, पिछला चुनाव पार्टी ने यहां 1.78 लाख मतों से जीता था।
संगठन में हो सकता है बड़ा उलटफेर
बात अगर इलाहाबाद की करें तो यहां भी संगठन के पदाधिकारी दावे तो तमाम करते रहे, लेकिन धरातल पर संगठन उस तरह से काम नहीं कर रहा था जिस तरह की उम्मीद की जा रही थी। महानगर अध्यक्ष राजेंद्र मिश्र, यमुनापार अध्यक्ष विनोद प्रजापति, गंगापार अध्यक्ष कविता पटेल की कार्यशैली भी पूरे चुनाव भर प्रश्नवाचक बनी रही।
दरअसल, भाजपा संगठन यह मानकर चल रहा था कि पिछले दो चुनाव में मोदी के नाम पर वोट पड़े हैं। इस बार भी पड़ जाएंगे। कम मतदान पर शीर्ष नेतृत्व पहले ही नाराजगी जता चुका है। अब इलाहाबाद सीट गंवाने और फूलपुर मामूली अंतर से जीतने पर माना जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में संगठन में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
इस बीच भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष नरेंद्र देव पांडेय ने भी संगठन पदाधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं। नरेंद्र देव बताते हैं कि स्थानीय संगठन ही हार की प्रमुख वजहाें में शामिल है। उन्होंने बताया कि प्रदेश एवं राष्ट्रीय स्तर के तमाम पदाधिकारी यहां आए तो जरूर, लेकिन बैठकों तक ही वह सीमित रहे। स्थानीय संगठन ने उन नेताओं को किसी भी गांव आदि का दौरा तक नहीं कराया। इतना ही नहीं, विपक्ष की ओर से संविधान व आरक्षण को लेकर जो बयानबाजी की जा रही थी, उसकी सफाई भी वोटरों तक संगठन के पदाधिकारी नहीं दे सके।
इलाहाबाद के विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को मिले मत का ब्योरा
विधानसभा - वर्ष 2024 -वर्ष 2019-
मेजा ----70034 ---86222
करछना ----80032 ---98832
दक्षिणी ----86312---98470
बारा ----79442 ----103723
कोरांव -----86422----105957