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नरेंद्र गिरि : प्रयागराज के प्रतापपुर के रहने वाले थे महंत नरेंद्र गिरि, हरिद्वार कुंभ में बने थे पहली बार महात्मा

Wed, 22 Sep 2021 01:27 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 22 Sep 2021 01:27 PM IST
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Narendra Giri: Mahant Narendra Giri was a resident of Pratappur in Prayagraj, was identified by this name in the area.
महंत नरेंद्र गिरी
प्रयागराज में प्रतापपुर ब्लाक के छितौना गांव के रहने वाले थे अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी। चार भाई और दो बहनों में दूसरे नंबर के नरेंद्र गिरि के पिता जब चार साल के थे तभी उनके पिता ठाकुर भानु प्रताप सिंह अचानक घर छोड़कर लापता हो गए। उनका आज तक पता नहीं चला।
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1995 में अचानक हो गए थे लापता
मां सुराजा देवी ने चार वर्ष की अस्था में ही नरेंद्र सिंह उर्फ बुद्धू (नरेंद्र गिरि) को अपने मायके पहुंचा दिया था। नरेंद्र गिरि के नाना सरजू प्रताप सिंह और मामा अभय प्रताप सिंह प्रयागराज में ही धनुपुर ब्लाक के अंतर्गत आने वाले गिर्दकोट के रहने वाले थे। अपने मामा के यहां कुछ दिन रहने के बाद 1983 में नरेंद्र गिरि ने अपने मामा का घर छोड़ दिया और इधर उधर घूमने फिरने लगे। कुछ दिन बाद 1995 में वह अचानक लापता हो गए। काफी खोजबीन करने के बाद भी उनका कुछ पता नहीं चला।
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सुसाइड नोट में लिखा घर से कोई संबंध नहीं
वर्ष 2004 में बाघंबरी गद्दी का पीठाधीश्वर एवं संगम तट पर स्थित बड़े हनुमान मंदिर (लेटे हनुमानजी) के महंत बन गए। गांव में इन्हें लोग नरेंद्र उर्फ बुद्धू सिंह के नाम से जानते हैं। उनकी मौत की खबर से गांव सहित आसपास के इलाकों में शोक की लहर दौड़ गई है। उनकी बहन और परिवार के तमाम सदस्य मठ पहुंच गए।  हालांकि सुसाइड नोट में महंत ने यह लिखा है कि उनका घर से कोई संबंध नहीं था न ही उन्होंने घर पर एक भी पैसा दिया है।
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Narendra Giri: Mahant Narendra Giri was a resident of Pratappur in Prayagraj, was identified by this name in the area.
prayagraj news : लेटे हनुमानजी। - फोटो : prayagraj
2015 में पहली बार उज्जैन महाकुंभ में बने अखाड़ा परिषद सचिव
नरेंद्र गिरि करीब 20 वर्ष की उम्र में एक साधु के तौर पर पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी से जुड़े। हरिद्वार के कुंभ में ही वह पहली बार महात्मा और अखाड़े की परंपरा के तहत नागा संन्यासी बने। इसके बाद सेवादार के तौर पर राजस्थान के खीरम स्थित अखाड़े के आश्रम में रहे। 1998 में हरिद्वार कुंभ में ही वह अखाड़े के अष्टकौशल में कारबारी यानी उप महंत के रूप में चुने गए।

फिर 2001 में वह अष्ट कौशल के श्रीमहंत बने। मठ बाघंबरी गद्दी के महंत भगवान गिरि के ब्रह्मलीन होने के बाद नरेंद्र गिरि को उनका उत्तराधिकारी घोषित करते हुए वर्ष 2004 में मठ का महंत बनाया गया। वर्ष 2015 में उज्जैन कुंभ में उन्हें पहली बार अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का सचिव बनाया गया और फिर उज्जैन कुंभ में ही वह अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष बने। 

निरंजनी अखाड़े के हरिद्वार के सचिव महंत रविंद्र पुरी के मुताबिक अखाड़े के चार सचिवों में नरेंद्र गिरि प्रयागराज के सचिव थे। प्रयागराज के दूसरे सचिव महंत ओंकार गिरि हैं। वहीं निरंजनी अखाड़े के हरिद्वार के दूसरे सचिव महंत रामरतन गिरि हैं।

निरंजनी अखाड़े का ही है संगम तट स्थित लेटे हनुमान मंदिर
त्रिवेणी बांध स्थित लेटे हनुमानजी का मंदिर पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी मठ बाघंबरी गद्दी के क्षेत्राधिकार के तहत आता है। इसलिए मठ बाघंबरी गद्दी का महंत बनने के साथ ही नरेंद्र गिरि लेटे हुए हनुमान मंदिर के भी महंत थे। 
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