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High Court : विशेष परिस्थितियों में सत्र न्यायालय के बजाए सीधे हाईकोर्ट में दायर कर सकते हैं जमानत अर्जी

Mon, 17 Aug 2026 06:10 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 17 Aug 2026 06:10 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि विशेष परिस्थितियों में सत्र न्यायालय के बजाय सीधे हाईकोर्ट में जमानत अर्जी दायर की जा सकती है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पहले सत्र न्यायालय जाने की अनिवार्यता को लेकर शिकायतकर्ता की आपत्ति खारिज करते हुए आरोपी की जमानत अर्जी मंजूर कर ली।

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In special circumstances, a bail application filed directly in High Court instead of Sessions Court.
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि विशेष परिस्थितियों में सत्र न्यायालय के बजाय सीधे हाईकोर्ट में जमानत अर्जी दायर की जा सकती है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पहले सत्र न्यायालय जाने की अनिवार्यता को लेकर शिकायतकर्ता की आपत्ति खारिज करते हुए आरोपी की जमानत अर्जी मंजूर कर ली। यह आदेश न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की एकलपीठ ने 64 वर्षीय आरोपी पोनुरु श्री निवासालु की जमानत याचिका पर दिया है। ललितपुर के कोतवाली थाने में याची के खिलाफ जबरन वसूली, धोखाधडी, आपराधिक षडयंत्र व विश्वासघात के आरोप में प्राथमिकी दर्ज है। उसने जमानत के लिए हाईकोर्ट में जमानत अर्जी दायर की।

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शिकायतकर्ता के वकील ने दलील दी कि याची की जमानत अर्जी सीजेएम कोर्ट ने रद्द कर दी है। वह सत्र न्यायालय में जमानत अर्जी दाखिल किए बिना सीधे हाईकोर्ट आ गए हैं। ऐसे में यह जमानत अर्जी सुनवाई योग्य नहीं है। आरोपी के वकील ने दलील दी कि शिकायतकर्ता की कंपनी की ललितपुर में मजबूत पकड़ है। वह और शिकायतकर्ता दोनों नेल्लोर, आंध्र प्रदेश के निवासी हैं। ऐसे में उसे परेशान करने के उद्देश्य से ललितपुर में एफआईआर दर्ज कराई गई।

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यह भी दलील दी कि उसके पैरोकारों को स्थानीय भाषा की पर्याप्त जानकारी नहीं है। ललितपुर की अदालत में दस्तावेज हासिल करने, जरूरी कागजात जुटाने और वकील की व्यवस्था करने में भी कठिनाई हो रही है। इसके अलावा शिकायतकर्ता के पूर्व विधायक होने और राजनीतिक प्रभाव होने की बात भी कोर्ट के समक्ष रखी गई।

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हाईकोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि प्रस्तुत विशेष परिस्थितियां सीधे हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल करने को उचित ठहराती हैं। लिहाजा शिकायतकर्ता की प्रारंभिक आपत्ति खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने पाया कि कथित घटना वर्ष 2014 से 2016 के बीच की है, जबकि एफआईआर वर्ष 2025 में दर्ज हुई। अन्य कई तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने जमानत दे दी।

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