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शोध में सामने आए चौंकाने वाले नतीजे: AI से काम हुआ आसान पर सोचने-समझने की क्षमता घटी, ईमानदारी सबसे बड़ी चिंता
मयंक श्रीवास्तव, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: Sharukh Khan
Updated Thu, 05 Mar 2026 03:47 PM IST
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सार
जर्नल ऑफ कंप्यूटर इंफॉर्मेशन सिस्टम में प्रकाशित शोध में चौंकाने वाले नतीजे सामने आए हैं। एआई से काम आसान हो गया है, पर सोचने-समझने की क्षमता घट गई है। चैट जीपीटी जैसे एआई टूल्स का इस्तेमाल करने वाले गलत व सही के द्वंद्व से जूझते रहते हैं।
चैट जीपीटी
- फोटो : chat gpt
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विस्तार
क्या चैट जीपीटी से होमवर्क लिखवाना नकल है? क्या आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक के इस्तेमाल से दफ्तर की रिपोर्ट बनाना बेईमानी है? एक शोध में यह सामने आया है कि चैट जीपीटी जैसे एआई टूल्स के इस्तेमाल के दौरान लोगों के मन में ये सवाल कौंधते रहते हैं।
जनवरी 2026 में जर्नल ऑफ कंप्यूटर इंफॉर्मेशन सिस्टम में प्रकाशित इस शोध में यह दावा भी किया गया है कि एआई ने काम को आसान तो बनाया है, लेकिन इसके उपयोग से लोगों में सोचने-समझने की क्षमता व रचनात्मकता घटी है। इस शोध के तहत भारत के 380 छात्रों, कारोबारियों व अन्य नागरिकों पर किए गए अध्ययन में सामने आए नतीजे चौंकाने वाले हैं।
लोग चैट जीपीटी को एआई टूल्स नहीं, बल्कि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा मानने लगे हैं पर इसके इस्तेमाल को लेकर उनके मन में गहरी नैतिक उलझनें भी हैं। इस शोध में पारुल गुप्ता, अपेक्षा हूडा, आनंद जेयाराज और डॉ.योगेश के द्विवेदी शामिल रहे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र डॉ.योगेश वर्तमान में किंग फहद यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड मिनरल्स, सऊदी अरब में रियाद बैंक चेयर प्रोफेसर ऑफ डिजिटल बिजनेस के पद पर कार्यरत हैं।
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जनवरी 2026 में जर्नल ऑफ कंप्यूटर इंफॉर्मेशन सिस्टम में प्रकाशित इस शोध में यह दावा भी किया गया है कि एआई ने काम को आसान तो बनाया है, लेकिन इसके उपयोग से लोगों में सोचने-समझने की क्षमता व रचनात्मकता घटी है। इस शोध के तहत भारत के 380 छात्रों, कारोबारियों व अन्य नागरिकों पर किए गए अध्ययन में सामने आए नतीजे चौंकाने वाले हैं।
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लोग चैट जीपीटी को एआई टूल्स नहीं, बल्कि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा मानने लगे हैं पर इसके इस्तेमाल को लेकर उनके मन में गहरी नैतिक उलझनें भी हैं। इस शोध में पारुल गुप्ता, अपेक्षा हूडा, आनंद जेयाराज और डॉ.योगेश के द्विवेदी शामिल रहे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र डॉ.योगेश वर्तमान में किंग फहद यूनिवर्सिटी ऑफ पेट्रोलियम एंड मिनरल्स, सऊदी अरब में रियाद बैंक चेयर प्रोफेसर ऑफ डिजिटल बिजनेस के पद पर कार्यरत हैं।
ईमानदारी सबसे बड़ी चिंता
शोध में यह निष्कर्ष निकला कि छात्रों को डर था कि चैट जीपीटी से किया गया काम बेईमानी तो नहीं है। कारोबारी चाहते थे कि चैट जीपीटी की मदद पारदर्शी तरीके ली जाए और आम लोगों को लगा कि भावनात्मक मामलों में इसका इस्तेमाल करना धोखा देने जैसा है। यानी चाहे स्कूल हो, दफ्तर हो या घर, ईमानदारी हर जगह पहले नंबर पर रही।
शोध में यह निष्कर्ष निकला कि छात्रों को डर था कि चैट जीपीटी से किया गया काम बेईमानी तो नहीं है। कारोबारी चाहते थे कि चैट जीपीटी की मदद पारदर्शी तरीके ली जाए और आम लोगों को लगा कि भावनात्मक मामलों में इसका इस्तेमाल करना धोखा देने जैसा है। यानी चाहे स्कूल हो, दफ्तर हो या घर, ईमानदारी हर जगह पहले नंबर पर रही।
डर भी है, फायदा भी
लोगों ने माना कि चैट जीपीटी से काम जल्द होता है। समय भी बचता है, लेकिन यह डर भी रहा कि इसके ज्यादा उपयोग से सोचने की क्षमता पर भी असर पड़ेगा। इसके अलावा लोग निजी जानकारी देने से भी डरते हैं। क्योंकि, पता नहीं चैट जीपीटी उस डाटा का क्या करेगा।
लोगों ने माना कि चैट जीपीटी से काम जल्द होता है। समय भी बचता है, लेकिन यह डर भी रहा कि इसके ज्यादा उपयोग से सोचने की क्षमता पर भी असर पड़ेगा। इसके अलावा लोग निजी जानकारी देने से भी डरते हैं। क्योंकि, पता नहीं चैट जीपीटी उस डाटा का क्या करेगा।
नियम-कानून की स्पष्टता जरूरी
शोध में पाया गया कि ज्यादातर संस्थाओं में एआई टूल्स के इस्तेमाल को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है। इस कारण लोग खुद ही फैसला करते हैं, जो कभी-कभी गलत साबित होता है। शोधकर्ताओं ने सुझाया कि संस्थाओं को अभी और स्पष्ट व पारदर्शी नीतियां बनाने की जरूरत है, वरना चैट जीपीटी का दुरुपयोग रोकना मुश्किल होगा।
शोध में पाया गया कि ज्यादातर संस्थाओं में एआई टूल्स के इस्तेमाल को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है। इस कारण लोग खुद ही फैसला करते हैं, जो कभी-कभी गलत साबित होता है। शोधकर्ताओं ने सुझाया कि संस्थाओं को अभी और स्पष्ट व पारदर्शी नीतियां बनाने की जरूरत है, वरना चैट जीपीटी का दुरुपयोग रोकना मुश्किल होगा।
