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UP: दिल्ली से पहले प्रयागराज में गूंजी थी ट्रेन की सीटी, 167 साल पहले आज ही के दिन चली उत्तर भारत की पहली रेल
राहुल शर्मा, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: Sharukh Khan
Updated Tue, 03 Mar 2026 03:00 PM IST
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सार
दिल्ली से पहले ट्रेन की सीटी प्रयागराज में गूंजी थी। 167 साल पहले आज ही के दिन प्रयागराज-कानपुर के बीच उत्तर भारत की पहली ट्रेन चली थी। तीन मार्च को ही यमुना किनारे किला के अंदर जाने वाली रेल लाइन खोली गई थी।
प्रयागराज जंक्शन की पुरानी तस्वीर
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
संगम नगरी और औद्योगिक नगरी कानपुर के लिए तीन मार्च की तारीख स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। आज से ठीक 167 वर्ष पूर्व यानी तीन मार्च 1859 को उत्तर भारत के रेल इतिहास का नया अध्याय शुरू हुआ था। इसी दिन देश के रेल मानचित्र पर प्रयागराज (तत्कालीन इलाहाबाद) और कानपुर एक साथ जुड़े थे।
इन दोनों ही शहरों के बीच पहली ट्रेन का संचालन हुआ। दिलचस्प बात यह है कि जब प्रयागराज में ट्रेन की सीटी गूंजी थी, तब देश की राजधानी दिल्ली तक रेलवे नेटवर्क का विस्तार नहीं हुआ था।
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इन दोनों ही शहरों के बीच पहली ट्रेन का संचालन हुआ। दिलचस्प बात यह है कि जब प्रयागराज में ट्रेन की सीटी गूंजी थी, तब देश की राजधानी दिल्ली तक रेलवे नेटवर्क का विस्तार नहीं हुआ था।
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देश में पहली बार 16 अप्रैल 1853 को मुंबई से ठाणे के बीच ट्रेन चली थी, लेकिन उत्तर भारत में पहली बार रेल संचालन 1859 में ही शुरू हो सका था। तब प्रयागराज से कानपुर के लिए चली ट्रेन में स्टीम इंजन लगा था। इतिहास के पन्नों को पलटें तो प्रयागराज-कानपुर रेलखंड का बड़ा हिस्सा मई 1856 में ही तैयार हो गया था। फरवरी 1857 में करीब 41 किलोमीटर के ट्रैक पर इंजन का ट्रायल भी सफल रहा।
योजना इसी वर्ष ट्रेन चलाने की थी, लेकिन देश के प्रथम स्वाधीनता संग्राम (1857 की क्रांति) के कारण यह कार्य पिछड़ गया। आखिरकार दो साल की देरी के बाद 1859 में इस रूट पर विधिवत संचालन शुरू हो सका। तब महज दस किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से पहली मालगाड़ी पुराना कानपुर यानी सीएनबी (कानपौर नार्थ बैरक्स ) तक गई थी। उत्तर मध्य रेलवे (एनसीआर) की काॅफी टेबल बुक में इसका उल्लेख है।
रणनीतिक उद्देश्य से हुई थी शुरुआत
शुरुआती दौर में प्रयागराज-कानपुर रेल लाइन का उपयोग मुख्य रूप से ब्रिटिश सेना की आवाजाही और सैन्य उपकरणों को ढोने के लिए किया गया था। उसी दौरान प्रयागराज स्थित किले के अंदर जाने वाली रेल लाइन भी खोली गई थी। खास बात यह है कि यह लाइन भी तीन मार्च 1859 को ही खोली गई। हालांकि, वर्ष 1954 के कुंभ के बाद इसे बंद कर दिया गया। देश की राजधानी दिल्ली को रेलवे नेटवर्क से जुड़ने में प्रयागराज के मुकाबले पांच साल और अधिक लगे। एक अगस्त 1864 को पहली ट्रेन हावड़ा से दिल्ली पहुंची थी।
शुरुआती दौर में प्रयागराज-कानपुर रेल लाइन का उपयोग मुख्य रूप से ब्रिटिश सेना की आवाजाही और सैन्य उपकरणों को ढोने के लिए किया गया था। उसी दौरान प्रयागराज स्थित किले के अंदर जाने वाली रेल लाइन भी खोली गई थी। खास बात यह है कि यह लाइन भी तीन मार्च 1859 को ही खोली गई। हालांकि, वर्ष 1954 के कुंभ के बाद इसे बंद कर दिया गया। देश की राजधानी दिल्ली को रेलवे नेटवर्क से जुड़ने में प्रयागराज के मुकाबले पांच साल और अधिक लगे। एक अगस्त 1864 को पहली ट्रेन हावड़ा से दिल्ली पहुंची थी।
देश के व्यस्ततम रूट में शामिल है प्रयागराज-कानपुर
प्रयागराज-कानपुर रेलमार्ग देश के व्यस्ततम रेल रूट में शामिल है। वर्तमान समय में इस रूट पर तकरीबन 150 ट्रेनों की आवाजाही है। खास बात यह है कि इस रूट पर सर्वाधिक तीन जोड़ी वंदे भारत के साथ छह जोड़ी राजधानी एक्सप्रेस ट्रेनों की भी आवाजाही हो रही है। अभी इस रूट पर ट्रेनों की अधिकतम स्पीड 130 किमी प्रतिघंटा है जो जल्द ही 160 किमी प्रतिघंटा हो जाएगी।
प्रयागराज-कानपुर रेलमार्ग देश के व्यस्ततम रेल रूट में शामिल है। वर्तमान समय में इस रूट पर तकरीबन 150 ट्रेनों की आवाजाही है। खास बात यह है कि इस रूट पर सर्वाधिक तीन जोड़ी वंदे भारत के साथ छह जोड़ी राजधानी एक्सप्रेस ट्रेनों की भी आवाजाही हो रही है। अभी इस रूट पर ट्रेनों की अधिकतम स्पीड 130 किमी प्रतिघंटा है जो जल्द ही 160 किमी प्रतिघंटा हो जाएगी।
रेलवे की दृष्टि से तीन मार्च का दिन विशेष है। वर्ष 1859 में पहली बार प्रयागराज-कानपुर रेल रूट नक्शे में शामिल हुआ। तब से अब तक रेलवे में तमाम परिवर्तन हो चुके हैं। अब इस रूट पर सेमी हाईस्पीड ट्रेन वंदे भारत का भी संचालन हो रहा है।- डॉ. अमित कुमार मालवीय, सीनियर पीआरओ, एनसीआर
