High Court : कंपनियों की तिजोरी से बड़ी श्रमिकों की भूख, अप्रैल 2014 से श्रमिकों को देना होगा बढ़ा बोनस
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि औद्योगिक इकाइयां वित्तीय बोझ का रोना रोकर श्रमिकों को उनके कानूनी लाभ से वंचित नहीं कर सकतीं। कंपनियों की तिजोरियों से बड़ी मजदूरों की भूख है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि औद्योगिक इकाइयां वित्तीय बोझ का रोना रोकर श्रमिकों को उनके कानूनी लाभ से वंचित नहीं कर सकतीं। कंपनियों की तिजोरियों से बड़ी मजदूरों की भूख है। उनके हक में बने कानून को सिर्फ इसलिए रद्द नहीं किया जा सकता कि कंपनी पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने 30 से अधिक नामचीन कंपनियों की याचिकाएं खारिज कर दीं। कंपनियों ने बोनस भुगतान (संशोधन) अधिनियम-2015 की सांविधानिक वैधता को चुनौती देते हुए याचिकाएं दाखिल की थीं।
केंद्र सरकार ने 2015 में कानून बदलकर बोनस पात्रता की सीमा 10,000 से बढ़ाकर 21,000 और गणना की सीमा 3,500 से बढ़ाकर 7,000 कर दी थी। इस संशोधन से ज्यादा वेतन पाने वाले कर्मचारी भी बोनस पाने के अधिकारी हो गए। इस नियम को सरकार ने एक वर्ष पहले (अप्रैल 2014) से लागू किया। इसके खिलाफ कंपनियों ने यह कहते हुए चुनौती दी कि पिछले साल की बैलेंस शीट बंद हो चुकी है। पिछली तारीख से भुगतान करने पर अचानक करोड़ों का बोझ पड़ेगा। यह असांविधानिक है। कोर्ट ने कंपनियों की दलील सिरे से खारिज कर दो टूक कहा कि बोनस दान नहीं, श्रमिकों का अधिकार है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के नीति निर्देशक तत्व सजावट के लिए नहीं हैं। कंपनियां यह दावा नहीं कर सकतीं कि पिछली तारीख से बोनस देने से उनका व्यापार ठप हो जाएगा। जब बात सामाजिक न्याय और श्रमिकों के कल्याण की हो तो उद्योगपतियों की वित्तीय कठिनाइयां जनहित और श्रमिक हित के सामने छोटी हो जाती हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियोक्ताओं का ऐसा कोई निहित अधिकार नहीं है कि वे बोनस न दें। संसद के पास श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए मुद्रास्फीति के अनुसार पिछली तारीख से नियमों में बदलाव करने की शक्ति है।
कर्मचारियों को होगा फायदा
इस फैसले के बाद अब उत्तर प्रदेश की हजारों औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों के लिए बोनस का रास्ता साफ हो गया है। कंपनियों को 2014 से लेकर अब तक का बकाया भुगतान करना होगा। इस संशोधन के बाद ज्यादा वेतन पाने वाले कर्मचारी भी बोनस के दायरे में आ गए हैं। बोनस की राशि भी लगभग दोगुनी हो गई है।
सेट ऑन और सेट ऑफ का प्रावधान सेफ्टी वाल्व
कोर्ट ने कहा कि कंपनियां बेवजह घबरा रही हैं। बोनस कानून की धारा-15 सेट ऑन और सेट ऑफ का प्रावधान सेफ्टी वाल्व जैसा है। यह मजदूरों के हक में है और मालिकों को भी राहत देता है। इस प्रावधान के तहत यदि किसी साल कंपनी को भारी मुनाफा होता है तो वह अतिरिक्त राशि भविष्य के लिए सुरक्षित रखती है (सेट-ऑन)। वहीं, घाटा होने या बोनस के लिए पैसा कम पड़ने पर कंपनी उस कमी को अगले चार वर्षों के मुनाफे से धीरे-धीरे एडजस्ट कर सकती है (सेट-ऑफ)। इस सुविधा के कारण पिछली तारीख से बोनस देना कंपनियों के लिए बोझ नहीं है।
