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Amroha News: नौगांवा के 18 क्रांतिकारी...हंसते-हंसते चढ़ गए फांसी के फंदे पर
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अमरोहा। वर्ष 1857 में मेरठ से उठी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांति की लपटें अमरोहा तक भी पहुंची थीं। नौगांवा सादात के जांबाजों ने भी अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। आजादी की जंग की रणनीति बना रहे 18 क्रांतिकारियों को अंग्रेजी फौज ने मोहल्ला शाहफरीद स्थित एक घर से गिरफ्तार किया था। करीब तीन महीने की सुनवाई के बाद सभी को सजा-ए-मौत सुनाई गई और बाद में मुरादाबाद की दमदमा कोठी में फांसी दे दी गई।
अंग्रेजी फौज ने बगावत को कुचलने के लिए क्रांतिकारियों की धरपकड़ शुरू की थी। इसी क्रम में मोहल्ला शाहफरीद में छापा मारकर 18 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया। धनौरा मार्ग से सटे गांव पीपली तगा की पीलीकोठी उस समय ब्रिटिश हुकूमत की अदालत थी। गिरफ्तार क्रांतिकारियों का मुकदमा संख्या 683 इसी पीलीकोठी में चला।
करीब तीन महीने चली सुनवाई के बाद अंग्रेजी जज ने सभी 18 क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई। इसके बाद डेथ वारंट पर मुहर लगाई गई। बताया जाता है कि 18 क्रांतिकारियों की मौत का डेथ वारंट भी पीलीकोठी में ही तैयार किया गया था। सजा सुनाए जाने के बाद सभी को मुरादाबाद की दमदमा कोठी ले जाकर फांसी दे दी गई।
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पीलीकोठी आज खंडहर में तब्दील हो चुकी है, लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक अंग्रेजी अदालत और क्रांतिकारियों के मुकदमे से जुड़ी यादें आज भी यहां मौजूद हैं।
शव तक परिजनों को नहीं सौंपे
दमदमा कोठी में फांसी देने के बाद अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों के शव भी परिजनों को नहीं सौंपे थे। बताया जाता है कि शवों को एक गहरे गड्ढे में डालकर उनके ऊपर नमक डाल दिया गया था। अंग्रेजी हुकूमत ने इस तरह इन वीरों की अंतिम विदाई तक को परिजनों से छीन लिया।
जुल्म के आगे नहीं झुके, हंसते हुए दिया बलिदान
अमरोहा के गौरव पुस्तक के लेखक पंडित भुवनेश शर्मा बताते हैं कि मेरठ की क्रांतिधरा से जब मंगल पांडे ने आजादी का बिगुल फूंका तो नौगांवा सादात के लोगों ने भी गुलामी की बेड़ियां तोड़ने का संकल्प लिया। उस समय नवाब मज्जू खां मुरादाबाद मंडल के हाकिम थे और दिल्ली की गद्दी पर बहादुर शाह जफर का शासन था। 1857 के गदर में नौगांवा के लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। बगावत को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने जुल्म की इंतहा कर दी, लेकिन क्रांतिकारियों का हौसला नहीं टूटा।
तीन महीने चली थी अंग्रेजी अदालत
पीपली तगा की पीलीकोठी में ब्रिटिश हुकूमत की अदालत लगती थी। यहीं नौगांवा सादात के 18 क्रांतिकारियों के खिलाफ मुकदमा नंबर 683 चलाया गया। करीब तीन महीने तक सुनवाई के बाद अंग्रेजी जज ने सभी को फांसी की सजा सुनाई। डेथ वारंट पर मुहर लगने के बाद इन्हें मुरादाबाद की दमदमा कोठी ले जाया गया, जहां फांसी दे दी गई।
आज भी याद हैं शहादत के निशान
पीलीकोठी कभी अंग्रेजी हुकूमत की अदालत हुआ करती थी। इसी स्थान पर नौगांवा के क्रांतिकारियों को मौत की सजा सुनाई गई। इमारत खंडहर में बदल चुकी थे, लेकिन ग्रामीण इसे 1857 की क्रांति से जुड़ी महत्वपूर्ण धरोहर मानते थे, लेकिन आज इस कोठी का अस्तित्व मिट चुका है यहां बिजली घर बन चुका है। दूसरी ओर मुरादाबाद की दमदमा कोठी 18 क्रांतिकारियों की शहादत की गवाह है।
इन क्रांतिकारियों ने दिया था सर्वोच्च बलिदान
वजीर अली, नजर अली, खादम अली, चिराग अली,असगर अली, बाबर अली, आगामीर, नियाज अली, उमराव अली, जवाहर अली, रहीम उल्ला, वजीरा, करीम उल्ला, इनायत अली, हिदायत अली, सज्जाद अली, बदर अली, फरहत अली।
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अंग्रेजी फौज ने बगावत को कुचलने के लिए क्रांतिकारियों की धरपकड़ शुरू की थी। इसी क्रम में मोहल्ला शाहफरीद में छापा मारकर 18 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया। धनौरा मार्ग से सटे गांव पीपली तगा की पीलीकोठी उस समय ब्रिटिश हुकूमत की अदालत थी। गिरफ्तार क्रांतिकारियों का मुकदमा संख्या 683 इसी पीलीकोठी में चला।
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करीब तीन महीने चली सुनवाई के बाद अंग्रेजी जज ने सभी 18 क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई। इसके बाद डेथ वारंट पर मुहर लगाई गई। बताया जाता है कि 18 क्रांतिकारियों की मौत का डेथ वारंट भी पीलीकोठी में ही तैयार किया गया था। सजा सुनाए जाने के बाद सभी को मुरादाबाद की दमदमा कोठी ले जाकर फांसी दे दी गई।
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पीलीकोठी आज खंडहर में तब्दील हो चुकी है, लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक अंग्रेजी अदालत और क्रांतिकारियों के मुकदमे से जुड़ी यादें आज भी यहां मौजूद हैं।
शव तक परिजनों को नहीं सौंपे
दमदमा कोठी में फांसी देने के बाद अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों के शव भी परिजनों को नहीं सौंपे थे। बताया जाता है कि शवों को एक गहरे गड्ढे में डालकर उनके ऊपर नमक डाल दिया गया था। अंग्रेजी हुकूमत ने इस तरह इन वीरों की अंतिम विदाई तक को परिजनों से छीन लिया।
जुल्म के आगे नहीं झुके, हंसते हुए दिया बलिदान
अमरोहा के गौरव पुस्तक के लेखक पंडित भुवनेश शर्मा बताते हैं कि मेरठ की क्रांतिधरा से जब मंगल पांडे ने आजादी का बिगुल फूंका तो नौगांवा सादात के लोगों ने भी गुलामी की बेड़ियां तोड़ने का संकल्प लिया। उस समय नवाब मज्जू खां मुरादाबाद मंडल के हाकिम थे और दिल्ली की गद्दी पर बहादुर शाह जफर का शासन था। 1857 के गदर में नौगांवा के लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। बगावत को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने जुल्म की इंतहा कर दी, लेकिन क्रांतिकारियों का हौसला नहीं टूटा।
तीन महीने चली थी अंग्रेजी अदालत
पीपली तगा की पीलीकोठी में ब्रिटिश हुकूमत की अदालत लगती थी। यहीं नौगांवा सादात के 18 क्रांतिकारियों के खिलाफ मुकदमा नंबर 683 चलाया गया। करीब तीन महीने तक सुनवाई के बाद अंग्रेजी जज ने सभी को फांसी की सजा सुनाई। डेथ वारंट पर मुहर लगने के बाद इन्हें मुरादाबाद की दमदमा कोठी ले जाया गया, जहां फांसी दे दी गई।
आज भी याद हैं शहादत के निशान
पीलीकोठी कभी अंग्रेजी हुकूमत की अदालत हुआ करती थी। इसी स्थान पर नौगांवा के क्रांतिकारियों को मौत की सजा सुनाई गई। इमारत खंडहर में बदल चुकी थे, लेकिन ग्रामीण इसे 1857 की क्रांति से जुड़ी महत्वपूर्ण धरोहर मानते थे, लेकिन आज इस कोठी का अस्तित्व मिट चुका है यहां बिजली घर बन चुका है। दूसरी ओर मुरादाबाद की दमदमा कोठी 18 क्रांतिकारियों की शहादत की गवाह है।
इन क्रांतिकारियों ने दिया था सर्वोच्च बलिदान
वजीर अली, नजर अली, खादम अली, चिराग अली,असगर अली, बाबर अली, आगामीर, नियाज अली, उमराव अली, जवाहर अली, रहीम उल्ला, वजीरा, करीम उल्ला, इनायत अली, हिदायत अली, सज्जाद अली, बदर अली, फरहत अली।