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विश्व पर्यटन दिवस: बागपत में है रामायण से लेकर महाभारत के इतिहास की अमिट कहानी

Fri, 27 Sep 2019 12:45 AM IST
मेरठ ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत Published by: मेरठ ब्यूरो Updated Fri, 27 Sep 2019 12:45 AM IST
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Baghpat tourism in from Ramayana period to Mahabharata, yet the system remained careless
बरनावा का टीला - फोटो : अमर उजाला

इतिहास के हर पन्ने पर बागपत की अमिट कहानी है। रामायण के वाल्मीकि मंदिर, रावण के नाम पर बड़ागांव और महाभारत के लाक्षागृह के चिह्न आज भी मौजूद हैं। चर्चाएं तो खूब र्हुइं, फसाने भी बनते रहे, लेेकिन कभी जिले के पर्यटन स्थलों का ढंग नहीं बदला। सिस्टम ने आंख बंद कर ली और धीरे-धीरे इतिहास मिटता रहा।



पर्यटन स्थलों की बातें तो हुई। मगर यहां सड़कों का जाल नहीं बिछाया गया। लोगों को आने की जाने की सुविधाएं नहीं दी गई। यही वजह है कि दुश्वारियों के कारण दिल्ली से नजदीकियों के बावजूद भी पर्यटक कभी जिले की तरफ नहीं घूम सकें।

 

 

Baghpat tourism in from Ramayana period to Mahabharata, yet the system remained careless
रोशनी से जगमगाता बालैनी का पुरा महादेव मंदिर। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो

खत्म हो रहे बरनावा के टीले
कहते हैं कि महाभारत का लाक्षागृह बागपत के बरनावा में था। मेरठ और कुरुक्षेत्र के बीच होने के कारण इस बात को बल भी मिलता है। ऊंचे टीले में इतिहास छिपा है। उत्खनन जरूर हुआ, लेकिन हाथ कुछ नहीं लगा। टीले पर मालिकाना हक के लिए मुकदमा चल रहा है। एतिहासिक स्थल को विकसित करने के लिए ठोस प्रयास नहीं किए गए। यही वजह है कि बरनावा अब रामभरोसे है।

श्री परशुरामेश्वर महादेव मंदिर
पुरा गांव का श्री परशुरामेश्वर महादेव मंदिर में साल में दो बार कांवड़ मेला और शिवभक्तों का जमावड़ा लगता है। मंदिर को पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित करने के लिए प्रयास नहीं किए गए। मंदिर कमेटी और जिला प्रशासन कईं बार आमने-सामने आ चुका है।

पर्यटकों को आकर्षित करने के बावजूद आवागमन की सुविधा नहीं होने के कारण यहां लोग नहीं पहुंचते। बागपत और बड़ौत से सार्वजनिक वाहन से यहां पहुंचना आसान नहीं है। परशुराम खेड़े के विकास के लिए सांसद डॉ. सत्यपाल सिंह ने प्रयास किया है। लेकिन यहां आवागमन की सुविधा नहीं होने से पर्यटकों को नहीं लुभा पाता।

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जैन मंदिर - फोटो : अमर उजाला

कौन लेगा मंशा देवी मंदिर की सुध
बड़ागांव में एतिहासिक मंशा देवी मंदिर है। लेकिन इसके इतिहास से पर्यटक अंजान है। सरकार की ओर से ठोस प्रयास नहीं किए गए। बड़ागांव में कभी लंकापति रावण भी आए थे, जिस कारण बड़ा गांव का दूसरा नाम रावण उर्फ बड़ागांव है।

देश में यह अकेला ऐसा गांव है जिसका नामकरण रावण के नाम पर है। इसके बावजूद गांव को पर्यटन के नक्शे पर चमकाने के कोई प्रयास नहीं हुए और मंदिर की सुध किसी ने नहीं ली। बालैनी के श्री वाल्मीकि मंदिर का जुड़ाव भी रामायण से माना जाता है।

ईस्टर्न पेरिफेरल से नहीं जोड़ा गया जैन मंदिर
बड़ागांव का एतिहासिक जैन मंदिर को ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे से नहीं जोड़ा गया। मंदिर कमेटी और बड़ागांव के लोगों की मांग थी कि एक्सप्रेस-वे पर मंदिर के सामने कट दिया जाना चाहिए। इससे यहां पर पर्यटक बढ़ेंगे। लेकिन एक्सप्रेस-वे पर कट नहीं दिया जा सका।

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लाक्षागृह की गुफा का रास्ता - फोटो : अमर उजाला

गुम हो गया महाभारत सर्किट
बागपत से बरनावा और हस्तिनापुर तक के क्षेत्र को 13 साल पहले महाभारत सर्किट में शामिल किया गया था। उत्तर प्रदेश के पर्यटन मंत्री रहे दिवंगत नवाब कोकब हमीद की पहल पर केंद्र सरकार ने सर्किट को मंजूरी दी। पांच करोड़ रुपये खर्च भी हुए, लेकिन इस क्षेत्र का पर्यटन की दृष्टि से कोई विकास नहीं हुआ।

नवाब कोकब हमीद ने वर्ष 2005-06 में केंद्र सरकार को महाभारत सर्किट का प्रस्ताव भेजा था। केंद्र सरकार ने इस सर्किट को मंजूरी दी। यही नहीं आठ करोड़ रुपये मंजूर किए, जिनमें से पांच करोड़ रुपये खर्च किए गए। लेकिन इस सर्किट का विकास नहीं हो सका।

बरनावा से बागपत तक आज भी गुफा
बरनावा से बागपत तक करीब 30 किमी लंबी गुफा वर्तमान में भी बताई जाती है। लोगों का दावा है कि इसी गुफा के जरिए वार्णावृत्त से पांडव बच निकलते हुए बागपत तक पहुंचे थे। पर्यटन सर्किट में शामिल होने के बाद सुरंग का आगे का हिस्सा पक्का करा दिया गया। बरनावा और बागपत की कश्यप कालोनी में यमुना किनारे स्थित खंडवारी में इसके प्रमाण आज भी मौजूद हैं।

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सिनौली गांव में उत्खनन - फोटो : अमर उजाला

सिनौली से निकला इतिहास, संजोए कौन
सबसे पहले वर्ष 2005 के सितंबर माह में सिनौली में खुदाई का कार्य कराया गया था। यहां हड़प्पाकालीन शवादान गृह मिला था। इससे इस क्षेत्र में हड्प्पाकालीन सभ्यता की पुष्टि हो गई थी। इसके बाद वर्ष 2015 में चंदायन गांव में उत्खनन से चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण काल, गुप्त और राजपूत सभ्यताओं के प्रमाण भी मिल चुके हैं।

साल 2018 में सिनौली में हुए उत्खनन में यहां एतिहासिक रथ और कंकाल मिले। इसके बावजूद सिनौली क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से विकसित नहीं किया गया।बागपत चेयरमैन एडवोकेट राजूदीन का कहना है कि सरकार को प्रयास कर जिले का विकास करना चाहिए। सपा जिलाध्यक्ष मनोज चौधरी का कहना है कि बरनावा और सिनौली पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है।

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