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Ballia News: मंगल पांडेय की देशभक्ति के कायल थे जल्लाद

Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 07 Apr 2026 11:08 PM IST
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The executioner was convinced of Mangal Pandey's patriotism.
नगवा गांव ​स्थित शहीद मंगल पांडेय की प्रतिमा।संवाद
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दुबहर। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 का बिगुल फूंकने वाले मंगल पांडेय को आठ अप्रैल 1857 को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया था। इनकी फांसी एक दिन टल गई थी। क्योंकि जल्लादों ने ऐसा करने से मना कर दिया था। क्योंकि मंगल पांडेय की देशभक्ति के कायल जल्लाद भी थे। दोबारा कोलकाता से जल्लाद बुलाए गए और आठ अप्रैल को उन्हें दी गई।
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30 जनवरी 1831 को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन गाजीपुर जनपद के बलिया तहसील के गंगा तीरी गांव नगवां में जन्मे मंगल पांडेय पश्चिम बंगाल अंतर्गत बैरकपुर छावनी में 34 नंबर देसी पैदल सेना की 19वीं रेजीमेंट की पांचवीं कंपनी के 1446 नंबर के फौजी सिपाही थे। उनमें देश भक्ति का जज्बा था। उस समय अंग्रेजों के अत्याचार से जनता कराह रही थी। इसी बीच मंगल पांडेय को पता चला कि जो कारतूस दांत से खींचकर चलाते हैं, वह गाय और सूअर की चर्बी से तैयार होता है। इस घटना ने आग में घी का काम किया। 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में मंगल पांडेय नाराज हो गए और अपने साथियों को क्रांति के लिए ललकारा। बैरकपुर छावनी को अंग्रेजों के सिपाहियों ने घेर लिया। इसके बाद मंगल पांडेय ने सार्जेंट मेजर ह्यूशन और लेफ्टिनेंट बाॅब को मौत के घाट उतारकर क्रांति की शुरुआत कर दी। मंगल पांडेय पकड़े गए और उन पर मुकदमा चला। छह अप्रैल 1857 को फौजी अदालत में मंगल पांडेय को राजद्रोह एवं बगावत का दोषी करार देते हुए फांसी देने का आदेश दिया गया। सात अप्रैल को फांसी देने के लिए दो जल्लादों को बुलाया गया। लेकिन उन्होंने सूली पर चढ़ाने से इन्कार कर दिया। क्योंकि मंगल पांडेय की देशभक्ति के कायल जल्लाद भी थे। दोबारा कोलकाता से जल्लाद बुलाए गए और आठ अप्रैल 1857 को प्रातः 5:30 बजे बैरकपुर छावनी के परेड ग्राउंड में उन्हें फांसी दे दी गई। बैरकपुर छावनी से उठी क्रांति की चिंगारी 1942 में शोला बनकर धधक उठी। 10 मई को मेरठ व 11 मई को दिल्ली में भड़का विद्रोह 15 अगस्त 1947 को देश आजाद कराकर ही शांत हुआ।
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शहीदों की कुर्बानी को लोग भूलते जा रहे : बब्बन विद्यार्थी
सोए भारत को जगाने वाले मंगल पांडेय ने अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध जो आवाज उठाई, उसकी गूंज किसी न किसी रूप में अब भी सुनाई पड़ती है। लेकिन लोग शहीदों की कुर्बानियों को भूलते जा रहे हैं। ये बातें मंगल पांडेय विचार सेवा समिति के प्रवक्ता बब्बन विद्यार्थी ने पत्रकारों से बातचीत में कहीं। कहा कि बलिया की अस्मिता, परंपरा, संस्कृति और यहां की माटी की खुशबू बरकरार रखने के लिए युवाओं में देश भक्ति का जज्बा पैदा करना होगा। यदि हम समर्पण भाव से इतना कर सकें तो यही शहीद के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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