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Balrampur News: पहाड़ी नालों की बाढ़ से हर साल घिरते हैं 20 से अधिक गांव
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
Updated Thu, 18 Jun 2026 11:26 PM IST
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बलरामपुर के खरझार पहाड़ी नाले पर जर्जर तटबंध ।
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बलरामपुर। जिले में राप्ती नदी के साथ पहाड़ी नाले भी हर साल बाढ़ का कारण बनते हैं। सोहेलवा वन्यजीव क्षेत्र से निकलने वाले कई नाले बरसात में उफान पर आ जाते हैं। इनसे हर वर्ष 20 से अधिक गांव प्रभावित होते हैं और सैकड़ों बीघा फसलें डूब जाती हैं। वर्ष 2009 से 2025 के बीच 25 गांव 16 बार इन नालों की बाढ़ की चपेट में आ चुके हैं।
हेंगहा, ककरहवा, जमधरा, कचनी, फोहरी, गौरिया और धोबिनिया प्रमुख नाले हैं। हरिहरगंज-ललिया-बरदौलिया मार्ग पर लौकहवा गांव के पास दो से तीन फीट जलभराव होता है। इससे 50 से अधिक गांवों का आवागमन बाधित हो जाता है। अपर जिलाधिकारी ज्योति राय ने बताया कि बाढ़ पूर्व तैयारियों के तहत नालों की सिल्ट सफाई कराई जा रही है।
प्रशासन आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। किसान पप्पू, राधेश्याम, राजू और मेहताब बताते हैं कि धान, मक्का, अरहर और उड़द की फसलें डूब जाती हैं। इससे परिवारों के समक्ष आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है।
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सर्वाधिक प्रभावित गांव और राहत के प्रयास
आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, जम्बूदीप, लालाजोत, लिलवा, खजुरिया, भुसैलवा समेत 25 गांव 2009 से 2025 के बीच 16 बार बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। सिंचाई और बाढ़ खंड इस बार पहाड़ी नालों की सिल्ट सफाई करा रहा है। अधिकारियों का दावा है कि इससे जल निकासी क्षमता बढ़ेगी और बाढ़ से राहत मिलेगी। हालांकि, ग्रामीणों का मानना है कि केवल सिल्ट सफाई पर्याप्त नहीं है। कटानरोधी कार्य, स्थायी जल निकासी और ऊंचे पुलों का निर्माण भी आवश्यक है।
किसानों को होता है सबसे ज्यादा नुकसान
मदारगढ़, कमदी, परसहवा, ठड़क्की, बनघुसरी, इटैहिया, चनियाकोट, किला, भुसैलिया, पिट्ठा, लखनीपुर, लौकहवा, ओदरहिया, नरायनपुर, प्रतापपुर और बुड़ंतपुर समेत 20 से अधिक गांवों में पहाड़ी नालों का पानी फैल जाता है। सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है। स्थानीय किसान पप्पू, राधेश्याम, राजू और मेहताब बताते हैं कि बारिश तेज होते ही खेतों में खड़ी धान, मक्का, अरहर और उड़द की फसलें पानी में डूब जाती हैं। कई बार पूरी खेती बर्बाद हो जाने से परिवारों के समक्ष आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है।
सिसई में बनेगा बाढ़ शरणालय
बाढ़ प्रभावित लोगों को सुरक्षित आश्रय देने के लिए कंपोजिट विद्यालय सिसई परिसर में एक बहुउद्देश्यीय बाढ़ शरणालय बनाया जाएगा। इसकी लागत करीब सात करोड़ रुपये होगी। बाढ़ के दौरान प्रभावित परिवारों को यहां ठहराया जाएगा। प्रशासन का मानना है कि इससे आपदा के समय राहत और बचाव कार्य बेहतर ढंग से संचालित होंगे।
हेंगहा, ककरहवा, जमधरा, कचनी, फोहरी, गौरिया और धोबिनिया प्रमुख नाले हैं। हरिहरगंज-ललिया-बरदौलिया मार्ग पर लौकहवा गांव के पास दो से तीन फीट जलभराव होता है। इससे 50 से अधिक गांवों का आवागमन बाधित हो जाता है। अपर जिलाधिकारी ज्योति राय ने बताया कि बाढ़ पूर्व तैयारियों के तहत नालों की सिल्ट सफाई कराई जा रही है।
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प्रशासन आपात स्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। किसान पप्पू, राधेश्याम, राजू और मेहताब बताते हैं कि धान, मक्का, अरहर और उड़द की फसलें डूब जाती हैं। इससे परिवारों के समक्ष आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है।
सर्वाधिक प्रभावित गांव और राहत के प्रयास
आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार, जम्बूदीप, लालाजोत, लिलवा, खजुरिया, भुसैलवा समेत 25 गांव 2009 से 2025 के बीच 16 बार बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। सिंचाई और बाढ़ खंड इस बार पहाड़ी नालों की सिल्ट सफाई करा रहा है। अधिकारियों का दावा है कि इससे जल निकासी क्षमता बढ़ेगी और बाढ़ से राहत मिलेगी। हालांकि, ग्रामीणों का मानना है कि केवल सिल्ट सफाई पर्याप्त नहीं है। कटानरोधी कार्य, स्थायी जल निकासी और ऊंचे पुलों का निर्माण भी आवश्यक है।
किसानों को होता है सबसे ज्यादा नुकसान
मदारगढ़, कमदी, परसहवा, ठड़क्की, बनघुसरी, इटैहिया, चनियाकोट, किला, भुसैलिया, पिट्ठा, लखनीपुर, लौकहवा, ओदरहिया, नरायनपुर, प्रतापपुर और बुड़ंतपुर समेत 20 से अधिक गांवों में पहाड़ी नालों का पानी फैल जाता है। सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है। स्थानीय किसान पप्पू, राधेश्याम, राजू और मेहताब बताते हैं कि बारिश तेज होते ही खेतों में खड़ी धान, मक्का, अरहर और उड़द की फसलें पानी में डूब जाती हैं। कई बार पूरी खेती बर्बाद हो जाने से परिवारों के समक्ष आर्थिक संकट खड़ा हो जाता है।
सिसई में बनेगा बाढ़ शरणालय
बाढ़ प्रभावित लोगों को सुरक्षित आश्रय देने के लिए कंपोजिट विद्यालय सिसई परिसर में एक बहुउद्देश्यीय बाढ़ शरणालय बनाया जाएगा। इसकी लागत करीब सात करोड़ रुपये होगी। बाढ़ के दौरान प्रभावित परिवारों को यहां ठहराया जाएगा। प्रशासन का मानना है कि इससे आपदा के समय राहत और बचाव कार्य बेहतर ढंग से संचालित होंगे।