Bijnor: 1857 की क्रांति में अंग्रेजों ने छोड़ दिया था शहर, कुएं में छिपाया था जिला मुख्यालय का खजाना
1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेज अफसरों ने करीब दस माह तक बिजनौर छोड़ दिया था। सरकारी खजाने को अंग्रेजों ने कलक्ट्रेट के पीछे स्थित गहरे कुएं में छिपा दिया था।
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1857 की क्रांति को देश की आजादी की पहली बड़ी लड़ाई के रूप में याद किया जाता है। मेरठ से 10 मई 1857 को शुरू हुई क्रांति की खबर 13 मई को बिजनौर पहुंची तो जिले में भी विद्रोह की चिंगारी भड़क उठी। अंग्रेज अधिकारियों ने स्थिति संभालने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन क्रांतिकारियों के बढ़ते प्रभाव के सामने उनकी पकड़ कमजोर होती गई।
आखिरकार 8 जून 1857 को अंग्रेज अधिकारियों ने बिजनौर छोड़ दिया और रुड़की चले गए। इसके बाद करीब दस महीने तक जिले में कोई अंग्रेज अधिकारी नहीं रहा। 26 अप्रैल 1858 को अंग्रेजी प्रशासन ने दोबारा बिजनौर में व्यवस्था संभाली।
13 मई को पहुंची मेरठ की क्रांति की खबर
बिजनौर के जिला गजेटियर के अनुसार, मेरठ में 10 मई 1857 को हुए विद्रोह की खबर 13 मई को बिजनौर पहुंची थी। खबर मिलते ही जिले में अंग्रेज अधिकारियों ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैयारियां शुरू कर दीं। भारतीय सैनिकों को छुट्टी से वापस बुलाया गया और स्थानीय जमींदारों से शहर की सुरक्षा में सहयोग मांगा गया। इसके बावजूद विद्रोहियों ने 21 मई को नगीना तहसील का खजाना लूट लिया। इसी दिन बिजनौर जेल में बंद 341 कैदियों ने विद्रोह कर जेल का गेट तोड़ दिया। मौके पर पहुंचे मजिस्ट्रेट ने गोली चलवाई, जिसमें सात लोग मारे गए। इसके बाद बड़ी संख्या में कैदी भागकर गंगा के रेतीले तट की ओर चले गए।
कलक्ट्रेट के पीछे कुएं में डाल दिया था सरकारी खजाना
क्रांति के दौरान अंग्रेजों के सामने सरकारी खजाने को बचाना बड़ी चुनौती बन गया था। जिला गजेटियर 1974 के पृष्ठ 48 के अनुसार, अंग्रेजों ने बिजनौर का सरकारी खजाना कलक्ट्रेट में स्थित एक गहरे कुएं में डाल दिया था। बाद में महमूद खान कई खाली गाड़ियों के साथ खजाना नजीबाबाद ले जाने के लिए बिजनौर पहुंचे, लेकिन अंग्रेज प्रशासन और स्थानीय जमींदारों की सक्रियता के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा।
एक जून को 250 अफगानों के साथ पहुंचे महमूद खान
एक जून 1857 को क्रांतिकारी महमूद खान 250 अफगानों के साथ बिजनौर पहुंचे। उस समय तक जिले में अंग्रेजी प्रशासन की पकड़ काफी कमजोर हो चुकी थी। खजाने की कुछ रकम मेरठ भेजी गई, जबकि बाकी रकम को सुरक्षित रखने के प्रयास किए जा रहे थे। इसी बीच 8 जून को अंग्रेज अधिकारियों ने बिजनौर छोड़ दिया और 11 जून को रुड़की पहुंच गए।
महमूद खान ने संभाली सत्ता, दस माह तक नहीं रहा अंग्रेज अधिकारी
अंग्रेज अधिकारियों के बिजनौर छोड़ने के बाद महमूद खान ने जिले में सत्ता संभाली। उन्होंने खुद को दिल्ली के बादशाह की ओर से बिजनौर का शासक घोषित किया। प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव किए गए, डाक व्यवस्था रोक दी गई और घाटों पर पहरा बैठा दिया गया। करीब दस महीने तक बिजनौर में कोई अंग्रेज अधिकारी नहीं रहा। क्रांति की लहर कमजोर पड़ने के बाद 26 अप्रैल 1858 को अंग्रेज अधिकारियों की दोबारा बिजनौर में नियुक्ति की गई और अंग्रेजी प्रशासन ने फिर से व्यवस्था संभाल ली।