{"_id":"6a6e50048e05ddb00202868c","slug":"prabals-body-was-found-while-searching-for-anjali-her-daughter-hasnt-returned-even-after-13-years-bijnor-news-c-14-mrt1029-1261422-2026-08-02","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bijnor News: अंजलि की तलाश में मिला था प्रबल का शव, 13 साल बाद भी नहीं लौटी बेटी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bijnor News: अंजलि की तलाश में मिला था प्रबल का शव, 13 साल बाद भी नहीं लौटी बेटी
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
2013 के नाव हादसे और बिजनौर हत्याकांड की गुत्थी ऐसे जुड़ी, मनोहरपुर का परिवार आज भी अंजलि के लौटने का कर रहा इंतजार
रविंद्र चौहान
हस्तिनापुर (मेरठ)। वर्ष 2013 की चार जनवरी का सर्द दिन आज समय बीतने के बाद भले ही सामान्य लग रहा हो, लेकिन हस्तिनापुर और बिजनौर के दो परिवारों के लिए यह जिंदगी का सबसे बड़ा आघात साबित हुआ। एक तरफ गंगा की लहरों में समाई बेटी की तलाश का दर्द था, तो दूसरी तरफ एक सनसनीखेज हत्याकांड का राज। इन दोनों घटनाओं के तार आपस में ऐसे उलझे बहन को तलाशने वाले भाई पिछले 13 वर्षों से आज भी अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।
वर्ष 2013 में बिजनौर के चर्चित प्रबल अग्रवाल हत्याकांड और हस्तिनापुर क्षेत्र के मनोहरपुर गांव में हुए नाव हादसे का ऐसा संयोग बना, जिसने दो अलग-अलग घटनाओं को हमेशा के लिए जोड़ दिया। जिस परिवार की बेटी अंजलि गंगा में लापता हुई थी, उसी की तलाश के दौरान उसके भाई को गंगा किनारे प्रबल अग्रवाल का शव मिला था। आज 13 वर्ष बाद भी मनोहरपुर का परिवार अपनी बेटी अंजलि के लौटने की आस लगाए बैठा है।
वर्ष 2013 में मनोहरपुर घाट पर गंगा पर पुल न होने के कारण उस समय मनोहरपुर के ग्रामीण खेड़ी घाट से नाव के सहारे हस्तिनापुर आते-जाते थे। घटना के चश्मदीद भाई अरविंद कुमार बताते हैं कि चार जनवरी 2013 की रात उसके माता-पिता बहनों के साथ खेत से गन्ने का काम निपटाकर करीब नौ बजे खेड़ी घाट पहुंचे। वहां मौजूद नाविक ने रात होने के कारण ट्रैक्टर-ट्रॉली ले जाने से मना कर दिया। इसके बाद उनके पिता कालूराम ने स्वयं ट्रैक्टर-ट्रॉली नाव पर चढ़ाकर नाव चलानी शुरू कर दी क्योंकि हस्तिनापुर में घर पर कोई नहीं था और बहनों को सुबह स्कूल जाना था। रात के समय जंगल से सुरक्षित घर आने का भी तकाजा था। कुछ दूरी पर पहुंचते ही नाव गंगा के तेज भंवर में फंस गई और पलट गई। नाव में उसके पिता कालूराम, उनकी मां दया, तीन बहनें मोनी, अलका और अंजलि सवार थे। उसके पिता कालूराम ने उसकी मां और दो बहनों मोनी और अलका को तो बचा लिया, लेकिन 19 वर्षीय अंजलि गंगा की तेज धारा में लापता हो गई। घटना के बाद सैकड़ों ग्रामीण कई दिनों तक गंगा और उसके किनारों पर अंजलि की तलाश करते रहे, लेकिन उसका कोई पता नहीं चल सका।
विज्ञापन
15 जनवरी 2013 को अरविंद अपने चचेरे भाई प्रवीण के साथ अंजलि की तलाश में खेड़ी घाट से करीब एक किलोमीटर नीचे गंगा किनारे पहुंचे। वहां झाड़ियों में एक अज्ञात युवक का शव पड़ा मिला। अरविंद ने शव की जेब से मोबाइल निकालकर उसमें मौजूद ''''दीदी'''' नाम से सेव नंबर पर कॉल किया। इसके बाद परिजन मौके पर पहुंचे और शव की पहचान बिजनौर निवासी प्रबल अग्रवाल के रूप में हुई। इसी के बाद दोनों युवक इस चर्चित हत्याकांड के महत्वपूर्ण गवाह बन गए।
अब 13 साल से कोर्ट के लगा रहे चक्कर
अरविंद बताते हैं कि वह अपनी बहन की तलाश कर रहे थे। और गंगा किनारे पड़ा शव मिलने के बाद पुलिस ने उन्हें और उनके चचेरे भाई प्रवीण को सरकारी गवाह बनाया। तब से दोनों लगातार बिजनौर कोर्ट में पेशी पर जाते रहे हैं। उनका कहना है कि बहन की तलाश में निकले थे, लेकिन एक चर्चित हत्याकांड के गवाह बन गए।
आज भी अंजलि के लौटने की उम्मीद
कालूराम बताते हैं कि नाव हादसे को 13 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन वह दिन आज भी उनकी आंखों के सामने है। हादसे में अपनी सबसे प्रिय बेटी अंजलि को खोने का दर्द आज भी कम नहीं हुआ। परिवार को अब भी उम्मीद है कि काश किसी दिन अंजलि के बारे में कोई सूचना मिल जाए।
विज्ञापन
रविंद्र चौहान
हस्तिनापुर (मेरठ)। वर्ष 2013 की चार जनवरी का सर्द दिन आज समय बीतने के बाद भले ही सामान्य लग रहा हो, लेकिन हस्तिनापुर और बिजनौर के दो परिवारों के लिए यह जिंदगी का सबसे बड़ा आघात साबित हुआ। एक तरफ गंगा की लहरों में समाई बेटी की तलाश का दर्द था, तो दूसरी तरफ एक सनसनीखेज हत्याकांड का राज। इन दोनों घटनाओं के तार आपस में ऐसे उलझे बहन को तलाशने वाले भाई पिछले 13 वर्षों से आज भी अदालतों के चक्कर काट रहे हैं।
वर्ष 2013 में बिजनौर के चर्चित प्रबल अग्रवाल हत्याकांड और हस्तिनापुर क्षेत्र के मनोहरपुर गांव में हुए नाव हादसे का ऐसा संयोग बना, जिसने दो अलग-अलग घटनाओं को हमेशा के लिए जोड़ दिया। जिस परिवार की बेटी अंजलि गंगा में लापता हुई थी, उसी की तलाश के दौरान उसके भाई को गंगा किनारे प्रबल अग्रवाल का शव मिला था। आज 13 वर्ष बाद भी मनोहरपुर का परिवार अपनी बेटी अंजलि के लौटने की आस लगाए बैठा है।
विज्ञापन
वर्ष 2013 में मनोहरपुर घाट पर गंगा पर पुल न होने के कारण उस समय मनोहरपुर के ग्रामीण खेड़ी घाट से नाव के सहारे हस्तिनापुर आते-जाते थे। घटना के चश्मदीद भाई अरविंद कुमार बताते हैं कि चार जनवरी 2013 की रात उसके माता-पिता बहनों के साथ खेत से गन्ने का काम निपटाकर करीब नौ बजे खेड़ी घाट पहुंचे। वहां मौजूद नाविक ने रात होने के कारण ट्रैक्टर-ट्रॉली ले जाने से मना कर दिया। इसके बाद उनके पिता कालूराम ने स्वयं ट्रैक्टर-ट्रॉली नाव पर चढ़ाकर नाव चलानी शुरू कर दी क्योंकि हस्तिनापुर में घर पर कोई नहीं था और बहनों को सुबह स्कूल जाना था। रात के समय जंगल से सुरक्षित घर आने का भी तकाजा था। कुछ दूरी पर पहुंचते ही नाव गंगा के तेज भंवर में फंस गई और पलट गई। नाव में उसके पिता कालूराम, उनकी मां दया, तीन बहनें मोनी, अलका और अंजलि सवार थे। उसके पिता कालूराम ने उसकी मां और दो बहनों मोनी और अलका को तो बचा लिया, लेकिन 19 वर्षीय अंजलि गंगा की तेज धारा में लापता हो गई। घटना के बाद सैकड़ों ग्रामीण कई दिनों तक गंगा और उसके किनारों पर अंजलि की तलाश करते रहे, लेकिन उसका कोई पता नहीं चल सका।
विज्ञापन
15 जनवरी 2013 को अरविंद अपने चचेरे भाई प्रवीण के साथ अंजलि की तलाश में खेड़ी घाट से करीब एक किलोमीटर नीचे गंगा किनारे पहुंचे। वहां झाड़ियों में एक अज्ञात युवक का शव पड़ा मिला। अरविंद ने शव की जेब से मोबाइल निकालकर उसमें मौजूद ''''दीदी'''' नाम से सेव नंबर पर कॉल किया। इसके बाद परिजन मौके पर पहुंचे और शव की पहचान बिजनौर निवासी प्रबल अग्रवाल के रूप में हुई। इसी के बाद दोनों युवक इस चर्चित हत्याकांड के महत्वपूर्ण गवाह बन गए।
अब 13 साल से कोर्ट के लगा रहे चक्कर
अरविंद बताते हैं कि वह अपनी बहन की तलाश कर रहे थे। और गंगा किनारे पड़ा शव मिलने के बाद पुलिस ने उन्हें और उनके चचेरे भाई प्रवीण को सरकारी गवाह बनाया। तब से दोनों लगातार बिजनौर कोर्ट में पेशी पर जाते रहे हैं। उनका कहना है कि बहन की तलाश में निकले थे, लेकिन एक चर्चित हत्याकांड के गवाह बन गए।
आज भी अंजलि के लौटने की उम्मीद
कालूराम बताते हैं कि नाव हादसे को 13 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन वह दिन आज भी उनकी आंखों के सामने है। हादसे में अपनी सबसे प्रिय बेटी अंजलि को खोने का दर्द आज भी कम नहीं हुआ। परिवार को अब भी उम्मीद है कि काश किसी दिन अंजलि के बारे में कोई सूचना मिल जाए।