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Deoria News: शहीद दिवस पर भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव के बलिदान को किया नमन
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
Updated Tue, 24 Mar 2026 01:22 AM IST
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भवानीगंज। महान क्रांतिकारी शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शहीद दिवस पर सोमवार को राजकीय महाविद्यालय डुमरियागंज में विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान स्वतंत्रता संग्राम में उनके अतुलनीय योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
संगोष्ठी में इतिहास विषय के प्राध्यापक अजय कुमार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के जीवन व उनके क्रांतिकारी योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सरदार भगत सिंह का जन्म 23 मार्च 1907 को पंजाब के लायलपुर (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनके पिता किशन सिंह और दादा स्वयं देशभक्त व क्रांतिकारी थे, जिसका प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अजय कुमार ने बताया कि कम उम्र में ही भगत सिंह के मन में देशभक्ति की भावना प्रबल हो गई थी। जलियांवाला बाग कांड ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, जिसके बाद उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना। प्रारंभ में वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े, लेकिन चौरीचौरा कांड के बाद आंदोलन वापस लिए जाने पर उन्होंने क्रांतिकारी मार्ग अपनाया।
उन्होंने आगे बताया कि भगत सिंह ने नौजवान सभा जैसे संगठनों के माध्यम से युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित किया। साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज और उनकी मृत्यु के बाद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने अंग्रेज अधिकारी सांडर्स की हत्या कर बदला लिया। इसके बाद 23 मार्च 1931 को तीनों क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई। उस समय भगत सिंह मात्र 23 वर्ष के थे, लेकिन उनके बलिदान ने पूरे देश में आजादी की अलख जगा दी।
कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राचार्य, समस्त प्राध्यापकगण, कार्यालय अधीक्षक महेश गुप्त, अमन, अनिल सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने भाग लेकर महान क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
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संगोष्ठी में इतिहास विषय के प्राध्यापक अजय कुमार ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के जीवन व उनके क्रांतिकारी योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि सरदार भगत सिंह का जन्म 23 मार्च 1907 को पंजाब के लायलपुर (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनके पिता किशन सिंह और दादा स्वयं देशभक्त व क्रांतिकारी थे, जिसका प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अजय कुमार ने बताया कि कम उम्र में ही भगत सिंह के मन में देशभक्ति की भावना प्रबल हो गई थी। जलियांवाला बाग कांड ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, जिसके बाद उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का रास्ता चुना। प्रारंभ में वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े, लेकिन चौरीचौरा कांड के बाद आंदोलन वापस लिए जाने पर उन्होंने क्रांतिकारी मार्ग अपनाया।
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उन्होंने आगे बताया कि भगत सिंह ने नौजवान सभा जैसे संगठनों के माध्यम से युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित किया। साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज और उनकी मृत्यु के बाद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने अंग्रेज अधिकारी सांडर्स की हत्या कर बदला लिया। इसके बाद 23 मार्च 1931 को तीनों क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई। उस समय भगत सिंह मात्र 23 वर्ष के थे, लेकिन उनके बलिदान ने पूरे देश में आजादी की अलख जगा दी।
कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्राचार्य, समस्त प्राध्यापकगण, कार्यालय अधीक्षक महेश गुप्त, अमन, अनिल सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने भाग लेकर महान क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि अर्पित की।