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Deoria News: डीजे के शोर में गुम हुआ फाग...ढोल-मजीरे को भी लोग भूले
संवाद न्यूज एजेंसी, देवरिया
Updated Tue, 03 Mar 2026 02:38 AM IST
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तुलसियापुर। समय में हुए बदलाव ने हमारे पारंपरिक संगीतों पर भी अपना असर दिखाया है। शोर-गुल के बीच कई पारंपरिक संगीत अपनी चमक खोने लगे हैं। इन्हीं संगीतों में फाग भी शामिल है। होली में ढोलक, झाल और मंजीरे पर गाया जाने वाला फाग अब बहुत ही कम स्थानों पर सुनने को मिलता है। वहीं, डीजे के शोर में युवा के साथ सभी पीढि़यां अब होली का उत्सव मनाने लगीं हैं।
गांव के विक्रम, विनोद, अखिलेश आदि का कहना है कि पाश्चात्य संस्कृति आज के युवाओं पर इस कदर हावी हो चुकी है कि वह अपनी पुरानी परंपराओं को भूल चुके हैं। एक समय था जब वसंत पंचमी के बाद से ही गांवों में जगह-जगह मतवालों की टोली बैठकर फाग गाती हुई मिलती थी। प्रतिदिन किसी ने किसी के दरवाजे पर फाग का आयोजन होता था। मतवालों की टोली बैठती थी और घर में भांग की पिसी जाती थी। इसके बाद महिलाओं द्वारा घर में पकवान बनाए जाते थे। यह क्रम होली के दिन तक चलता था। इसके बाद जिस दिन होलिका का दहन होता था। उस दिन होली जलने से पूर्व भी गांव के एक सार्वजनिक स्थान पर लोग जुटते थे और फाग का गायन करते थे। इसके बाद जोगिरा गाते हुए होलिका दहन होता था। देर रात को लोग सोने जाते थे। फिर सुबह उठकर लोगों के दरवाजे-दरवाजे घूमकर फाग का गायन करते हुए घूमते थे।
महिलाओं घरों के छतों से उनके ऊपर रंगों की बारिश करती थी, लेकिन समय बदला गांवों में वैमनस्य फैला और पाश्चात्य संस्कृति की मार इस त्योहार पर भी पड़ी। नई पीढ़ी होली के दिन डीजे लगाकर जगह-जगह झूमती नजर आती है। उसके पास फाग के प्रति कोई लगाव नहीं है, जिसके कारण आज ढोलक की थाप, झाल और मंजीरे की झंकार बहुत ही कम सुनने को मिलती है।
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आज बिरज में होली रे रसिया... गाने वाले हुड़दंगों की टोली गायब
तुलसियापुर। होली खेले रघुवीरा अवध में..., और आज बिरज में होली रे रसिया... गाती हुरियारों की टोली गायब हो गई है। ऐसे में बुजुर्गों को अपने पूर्वजों की इस थाती के विलुप्त होने की चिंता सताने लगी है, जबकि नई पीढ़ी का इसके प्रति कोई रुझान नहीं है। तालकुंडा के पूर्व प्रधान साधुशरण चौहान, मानपुर निवासी पूर्व प्रधानाध्यापक नंद किशोर चौधरी, श्रीरामलीला समिति औदही कलां के अध्यक्ष गंगाराम तिवारी बताते हैं कि अब साथियों के न होने से गांव में फाग का महत्व खत्म होता जा रहा है। युवा पीढ़ी इसे एकदम भूलती जा रही है। शिवरात्रि के बाद गांव में फगुआ गायकों की मंडली सक्रिय हो जाती थी, लेकिन अब यह परंपरा गांव से लगभग लुप्त होती जा रही है। पुराने फगुआ गायक अब नहीं रहे जो हैं भी अब वृद्ध हो चुके हैं। औदही कलां गांव के ही अवकाश प्राप्त चीफ फार्मासिस्ट डाॅ. राजेंद्र प्रसाद शुक्ल, सुमेरु गिरी, राम अचल, राम लखन शास्त्री कहते हैं कि हम लोग भक्ति पर आधारित फगुआ गाते थे। आज तो भोजपुरी और फिल्मी अश्लील गीत डीजे पर चल रहे हैं, जिस पर युवा थिरक कर होली मना रहे हैं। इसके चलते फगुआ गायन की परंपरा लुप्त होती जा रही है। अब गांवों में चल रही गोलबंदी के चलते लोग एक दूसरे के साथ बैठना पसंद नहीं करते, तब लोग दुश्मनी होने के बावजूद भी होली के रंग में दुश्मनी को भुला देते थे, लेकिन आज यह सब गायब हो चुका है।
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गांव के विक्रम, विनोद, अखिलेश आदि का कहना है कि पाश्चात्य संस्कृति आज के युवाओं पर इस कदर हावी हो चुकी है कि वह अपनी पुरानी परंपराओं को भूल चुके हैं। एक समय था जब वसंत पंचमी के बाद से ही गांवों में जगह-जगह मतवालों की टोली बैठकर फाग गाती हुई मिलती थी। प्रतिदिन किसी ने किसी के दरवाजे पर फाग का आयोजन होता था। मतवालों की टोली बैठती थी और घर में भांग की पिसी जाती थी। इसके बाद महिलाओं द्वारा घर में पकवान बनाए जाते थे। यह क्रम होली के दिन तक चलता था। इसके बाद जिस दिन होलिका का दहन होता था। उस दिन होली जलने से पूर्व भी गांव के एक सार्वजनिक स्थान पर लोग जुटते थे और फाग का गायन करते थे। इसके बाद जोगिरा गाते हुए होलिका दहन होता था। देर रात को लोग सोने जाते थे। फिर सुबह उठकर लोगों के दरवाजे-दरवाजे घूमकर फाग का गायन करते हुए घूमते थे।
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महिलाओं घरों के छतों से उनके ऊपर रंगों की बारिश करती थी, लेकिन समय बदला गांवों में वैमनस्य फैला और पाश्चात्य संस्कृति की मार इस त्योहार पर भी पड़ी। नई पीढ़ी होली के दिन डीजे लगाकर जगह-जगह झूमती नजर आती है। उसके पास फाग के प्रति कोई लगाव नहीं है, जिसके कारण आज ढोलक की थाप, झाल और मंजीरे की झंकार बहुत ही कम सुनने को मिलती है।
आज बिरज में होली रे रसिया... गाने वाले हुड़दंगों की टोली गायब
तुलसियापुर। होली खेले रघुवीरा अवध में..., और आज बिरज में होली रे रसिया... गाती हुरियारों की टोली गायब हो गई है। ऐसे में बुजुर्गों को अपने पूर्वजों की इस थाती के विलुप्त होने की चिंता सताने लगी है, जबकि नई पीढ़ी का इसके प्रति कोई रुझान नहीं है। तालकुंडा के पूर्व प्रधान साधुशरण चौहान, मानपुर निवासी पूर्व प्रधानाध्यापक नंद किशोर चौधरी, श्रीरामलीला समिति औदही कलां के अध्यक्ष गंगाराम तिवारी बताते हैं कि अब साथियों के न होने से गांव में फाग का महत्व खत्म होता जा रहा है। युवा पीढ़ी इसे एकदम भूलती जा रही है। शिवरात्रि के बाद गांव में फगुआ गायकों की मंडली सक्रिय हो जाती थी, लेकिन अब यह परंपरा गांव से लगभग लुप्त होती जा रही है। पुराने फगुआ गायक अब नहीं रहे जो हैं भी अब वृद्ध हो चुके हैं। औदही कलां गांव के ही अवकाश प्राप्त चीफ फार्मासिस्ट डाॅ. राजेंद्र प्रसाद शुक्ल, सुमेरु गिरी, राम अचल, राम लखन शास्त्री कहते हैं कि हम लोग भक्ति पर आधारित फगुआ गाते थे। आज तो भोजपुरी और फिल्मी अश्लील गीत डीजे पर चल रहे हैं, जिस पर युवा थिरक कर होली मना रहे हैं। इसके चलते फगुआ गायन की परंपरा लुप्त होती जा रही है। अब गांवों में चल रही गोलबंदी के चलते लोग एक दूसरे के साथ बैठना पसंद नहीं करते, तब लोग दुश्मनी होने के बावजूद भी होली के रंग में दुश्मनी को भुला देते थे, लेकिन आज यह सब गायब हो चुका है।
